देहदान का संकल्प: राष्ट्र सेवा की परंपरा को नया आयाम

बिलासपुर छग़ | समाज सेवा और राष्ट्रभक्ति के क्षेत्र में एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री लाल बिहारी सिंह ने मृत्यु पश्चात अपना शरीर चिकित्सा शोध और शिक्षा के लिए दान करने का संकल्प लिया है। जूना बिलासपुर स्थित कालकर कुंज संघ कार्यालय (मनोहर टॉकीज हनुमान मंदिर के पास) में यह कार्यक्रम ‘देहदान संकल्प दिवस’ के रूप में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100वें स्थापना वर्ष (शताब्दी वर्ष) के उपलक्ष्य में समाज को सार्थक संदेश देने के उद्देश्य से मूलतः जशपुर जिले के ग्राम टुकुटोली निवासी श्री सिंह ने यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उल्लेखनीय है कि उन्होंने सितंबर 1984 में इसी कालकर कुंज कार्यालय से अपने प्रचारक जीवन की शुरुआत की थी। वे महाकौशल प्रांत में लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे। श्री लाल बिहारी सिंह जी प्रांत सेवा प्रमुख तथा सिवनी जिले में जिला प्रचारक के दायित्व का निर्वहन कर चुके हैं।

देहदान संकल्प पत्र भरने की प्रक्रिया ‘माँ भारती’ के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ प्रारंभ हुई, जिससे पूरे वातावरण में सेवा और समर्पण की भावना का संचार हुआ।

अपने उद्बोधन में श्री लाल बिहारी सिंह ने कहा, “नदियाँ दूसरों के लिए बहती हैं, वृक्ष दूसरों को छाया और फल देते हैं, गौ माता दूसरों का पालन करती है। इसलिए हमारा जीवन भी हर अवस्था में समाज के लिए होना चाहिए। देहदान उसी समर्पण की सर्वोच्च भावना है।”

इस पुनीत अवसर पर उपस्थित सह प्रांत प्रचारक श्री नारायण नामदेव ने कहा कि प्रचारक का जीवन राष्ट्र सेवा की जीवंत मिसाल होता है और देहदान का यह संकल्प समाज को निःस्वार्थ सेवा का संदेश देता है।

विहिप सेवा प्रमुख श्री मनीष मोटवानी ने इस प्रक्रिया के सफल क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि जिला सेवा प्रमुख श्री नीरज जगवास ने देहदान से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों को दूर करने की आवश्यकता पर बल दिया।

इस दौरान पूर्व प्रचारक श्री नंदकिशोर शुक्ला ने भी बताया कि उन्होंने लगभग दस वर्ष पूर्व रायपुर मेडिकल कॉलेज में देहदान की घोषणा कर समाज को प्रेरित करने का प्रयास किया था।

श्री लाल बिहारी सिंह का यह संकल्प न केवल चिकित्सा शिक्षा और शोध के लिए उपयोगी सिद्ध होगा, बल्कि समाज में सेवा, त्याग और मानवता की भावना को भी सशक्त करेगा। यह कदम वास्तव में राष्ट्र सेवा की उस परंपरा को आगे बढ़ाता है, जो जीवन के अंतिम क्षण तक समाज के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

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