वोकिज्म के दौर में यथार्थ का सवाल

सच कहूँ तो आजकल जो “वोक” के नाम पर चल रहा है, उसे देखकर मुझे बार-बार यही लगता है कि हम चीज़ों को समझने की बजाय उन्हें जरूरत से ज़्यादा जटिल बना रहे हैं। पहले जो बातें सामान्य समझ का हिस्सा थीं, जिन पर आम इंसान बिना ज्यादा पढ़े-लिखे भी साफ राय रख सकता था, वही बातें आज बहस, सिद्धान्त और नए-नए शब्दों में उलझा दी गई हैं। पुरुष और स्त्री का फर्क क्या है—ये कभी ऐसा सवाल नहीं था जिस पर घंटों चर्चा करनी पड़े। यह रोजमर्रा की जिंदगी में दिखने वाली, अनुभव की जाने वाली चीज़ थी। लेकिन अब उसी सरल बात को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे यह कोई बहुत गहरी, अनिश्चित और बदलती हुई अवधारणा हो, जिसे समझने के लिए आपको पूरी नई शब्दावली सीखनी पड़े। नतीजा ये हो रहा है कि जहाँ पहले स्पष्टता थी, वहाँ अब भ्रम पैदा हो रहा है लोग समझने की बजाय ज्यादा उलझ रहे हैं, और खासकर युवा पीढ़ी के लिए यह और भी कठिन हो गया है कि वे बुनियादी चीज़ों को लेकर भी आत्मविश्वास से कुछ कह सकें।

अब यह कहा जा रहा है कि लिंग और जेंडर दोनों ही समाज ने बनाए हैं—यानि यह कोई प्राकृतिक या जैविक वास्तविकता नहीं, बल्कि लोगों द्वारा तय किया गया ढाँचा है। तर्क यह दिया जाता है कि इतिहास में समाज ने भूमिकाएँ बाँटीं, आदतें बनाईं, और धीरे-धीरे वही “सामान्य” लगने लगा। फिर इसी से यह निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि अगर समाज ने यह सब बनाया है, तो इसे बदला भी जा सकता है। बात यहीं तक रहती तो अलग थी, लेकिन अब इसे और आगे बढ़ाकर यह कहा जा रहा है कि पुरुष और स्त्री का जो फर्क है, वह भी असल में किसी प्राकृतिक व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि सत्ता में रहे लोगों द्वारा बनाया गया ढाँचा है—यानि जिसे हम आज “सामान्य” समझते हैं, वह भी बस एक ऐतिहासिक आदत है।

मुझे यहाँ दिक्कत इस बात से है कि इस पूरे तर्क में एक चीज़ बार-बार नजरअंदाज कर दी जाती है—कि समाज जो भी बनाता है, वह अक्सर किसी न किसी वास्तविकता पर ही टिकता है। इंसानी शरीर, प्रजनन की प्रक्रिया, हार्मोनल अंतर—ये सब चीज़ें पहले से मौजूद हैं, समाज ने इन्हें बनाया नहीं है। हाँ, समाज ने इनके आधार पर भूमिकाएँ और अपेक्षाएँ जरूर तय की होंगी, लेकिन यह कहना कि पूरा फर्क ही “बनाया हुआ” है, मुझे खिंचा हुआ लगता है। ऐसा लगता है जैसे एक तरफ सामाजिक व्यवहार की बात हो रही है, और दूसरी तरफ उसी के साथ-साथ जैविक आधार को भी उसी श्रेणी में डाल दिया गया है, जबकि दोनों एक ही चीज़ नहीं हैं।

मुझे यही बात सबसे ज़्यादा अटकती है। अगर हम हर चीज़ को सिर्फ इसी नजर से देखने लगें कि कौन किसे दबा रहा है, तो फिर कोई भी चीज़ अपनी जगह पर सही नहीं बचेगी। हर फर्क, हर व्यवस्था, हर परंपरा—सब कुछ बस “पावर गेम” बनकर रह जाएगा। यही सोच Critical Race Theory जैसी धाराओं में दिखाई देती है, जहाँ लगभग हर सामाजिक संरचना को शक्ति और नियंत्रण के नजरिए से समझा जाता है। लेकिन क्या सच में दुनिया की हर चीज़ को उसी एक फ्रेम में समझा जा सकता है? क्या हर अंतर का मतलब सिर्फ उत्पीड़न है? और सबसे जरूरी—क्या प्रकृति का इसमें कोई रोल ही नहीं है?
अगर सीधी और ईमानदार बात करें, तो जीवविज्ञान कुछ और ही बताता है। शरीर जैसा है, वह किसी की राय का नतीजा नहीं है—वह एक वास्तविकता है जिसे हम देख सकते हैं, माप सकते हैं। प्रजनन कैसे होता है, यह कोई सामाजिक समझौता नहीं है जिसे लोग बदल लें, यह प्रकृति का स्थापित नियम है। नर और मादा का फर्क कोई किताब में गढ़ी गई कहानी नहीं है, बल्कि यह वही चीज़ है जो हर जीवित प्रजाति में साफ दिखाई देती है। इसलिए जब हर चीज़ को केवल सामाजिक या राजनीतिक चश्मे से समझने की कोशिश की जाती है, तो वह अधूरी समझ बन जाती है, क्योंकि उसमें प्रकृति और वास्तविकता के हिस्से को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

समझने दो कि वो है क्या, उससे पहले ही उसे कहा जा रहा है कि वो कुछ भी हो सकता है—और यहीं से दिक्कत शुरू होती है। बच्चे उस उम्र में होते हैं जहाँ उन्हें स्थिरता और साफ़ समझ की ज़रूरत होती है, लेकिन उनके सामने ऐसी बातें रख दी जाती हैं जो खुद बड़े लोग भी ठीक से नहीं समझ पाते। और ये सिर्फ समझाने तक सीमित नहीं रहता—उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है कि अलग नाम रखो, नई पहचान अपनाओ, अलग-अलग चीज़ें “ट्राय” करो। मुझे सच में समझ नहीं आता कि इसे मदद कहा जाए या अनजाने में और ज़्यादा उलझन पैदा करना।

सबसे अजीब और चिंताजनक बात ये है कि अगर तुम इन चीज़ों पर सवाल उठाओ, तो तुरंत तुम्हें ही गलत ठहरा दिया जाता है। ऐसा लगता है जैसे एक लाइन खींच दी गई है—या तो तुम पूरी तरह सहमत रहो, या फिर तुम्हें चुप करा दिया जाएगा। बहस की जगह लेबलिंग हो रही है, सवाल की जगह दबाव। ये तरीका मुझे बिल्कुल सही नहीं लगता, क्योंकि जहाँ सवाल पूछने की जगह नहीं होती, वहाँ सच तक पहुँचना भी मुश्किल हो जाता है।

लेकिन अब बच्चों को क्या सिखाया जा रहा है? कि लिंग एक “स्पेक्ट्रम” है, कि तुम जैसा महसूस करो वही हो, और तुम अपनी पहचान खुद तय कर सकते हो—चाहो तो बदल भी सकते हो। बात यहीं खत्म नहीं होती, इसे इस तरह पढ़ाया जाता है जैसे जैविक लिंग और जेंडर पूरी तरह अलग-अलग चीज़ें हैं और एक का दूसरे से कोई जरूरी संबंध नहीं है। सुनने में यह “चॉइस” या “फ्रीडम” जैसा लगता है, लेकिन एक छोटे बच्चे के लिए यह बहुत जटिल बात है। उस उम्र में बच्चे ठोस चीज़ों के आधार पर समझ बनाते हैं—शरीर, परिवार, आसपास की दुनिया। अगर उसी समय उन्हें यह बताया जाए कि उनकी बुनियादी पहचान भी स्थिर नहीं है, तो यह स्वाभाविक रूप से भ्रम पैदा कर सकता है।

दूसरी तरफ, कई जीवविज्ञानी लगातार यह कह रहे हैं कि लिंग का एक स्पष्ट जैविक आधार है, जिसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। Richard Dawkins ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि लिंग की परिभाषा अंततः प्रजनन कोशिकाओं—गैमीट्स—पर आधारित होती है, जो नर और मादा के बीच स्पष्ट अंतर दिखाती हैं। इसी तरह Colin Wright का तर्क है कि भले ही प्रकृति में कुछ विविधताएँ और अपवाद मौजूद हों, लेकिन मूल जैविक ढाँचा द्विआधारी ही रहता है और उसी पर शरीर की संरचना, हार्मोन और कई अन्य विशेषताएँ आधारित होती हैं।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या हम इन स्थापित वैज्ञानिक बातों को पूरी तरह समझकर आगे बढ़ रहे हैं, या फिर उन्हें नज़रअंदाज़ करके एक नई व्याख्या थोप रहे हैं? और अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ही “गलत” या “पुराना” कहकर किनारे किया जाने लगे, तो फिर यह तय कैसे होगा कि सही क्या है और गलत क्या? यही वह जगह है जहाँ यह बहस सिर्फ विचारों की नहीं रह जाती, बल्कि सच्चाई को समझने के तरीके पर ही सवाल खड़ा कर देती है।

मुझे लगता है असली दिक्कत यहीं से शुरू होती है—हम धीरे-धीरे इस सोच के आदी होते जा रहे हैं कि जो महसूस हो वही सच है। शुरुआत में ये बात सुनने में अच्छी लगती है, क्योंकि हर किसी को अपनी बात रखने की आज़ादी मिलती है। लेकिन थोड़ा ठहरकर सोचो तो बात उतनी सीधी नहीं है। महसूस करना और सच होना एक ही चीज़ नहीं हैं। हम सब कई बार ऐसी चीज़ें महसूस करते हैं जो बाद में गलत निकलती हैं—डर, असुरक्षा, या किसी बात को लेकर गलत समझ। अगर हर भावना को ही सच मान लिया जाए, तो फिर सच की कोई अलग पहचान ही नहीं बचेगी।

यहीं से दिक्कत गहरी हो जाती है। अगर हर व्यक्ति अपना-अपना सच तय करने लगे, तो फिर कोई साझा आधार नहीं बचेगा जिस पर समाज खड़ा रह सके। कानून, शिक्षा, विज्ञान—ये सब इस बात पर टिके होते हैं कि कुछ चीज़ें स्थिर और सबके लिए समान हों। अगर हम हर चीज़ को व्यक्तिगत अनुभव पर छोड़ देंगे, तो फिर कोई भी बात तय करना मुश्किल हो जाएगा। आज एक बात सही लगेगी, कल वही बात किसी और के लिए गलत होगी—और इस तरह धीरे-धीरे एक तरह का भ्रम फैलता चला जाएगा।

मैं ये नहीं कह रहा कि लोगों की भावनाएँ मायने नहीं रखतीं। बिल्कुल रखती हैं। हर इंसान को सम्मान मिलना चाहिए, उसे अपनी बात कहने का अधिकार होना चाहिए। लेकिन सम्मान और सच को मिलाकर देखना सही नहीं है। किसी के साथ अच्छा व्यवहार करना एक बात है, और हकीकत को बदल देना दूसरी। अगर हम सिर्फ इसलिए किसी बात को सच मान लें क्योंकि कोई उसे महसूस करता है, तो हम खुद अपने पैरों के नीचे की जमीन कमजोर कर रहे हैं।

मुझे यही लगता है कि हमें एक संतुलन की जरूरत है। न तो इतना कठोर होना कि हम लोगों की भावनाओं को बिल्कुल न समझें, और न ही इतना ढीला कि हम हर भावना को सच मान लें। अगर हम ये संतुलन खो देंगे, तो आगे चलकर न केवल बहसें उलझेंगी, बल्कि हमारी समझ भी कमजोर होगी। और जब समझ कमजोर होती है, तो समाज भी धीरे-धीरे अस्थिर होने लगता है।

दीपक कुमार द्विवेदी कटनी

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