दो प्रचारक, एक संकल्प — व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक
सागर। हमारा इतिहास साक्षी है। जब हम इतिहास को पढ़ते हैं तो हमें प्रसंग मिलते हैं — महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, छत्रपति संभाजी, पृथ्वीराज चौहान, गुरु तेग बहादुर सिंह, गुरु गोविंद सिंह और ऐसे अनेकों वीर योद्धा जिन्होंने अपने समाज, अपने धर्म, अपने राष्ट्र के लिए बलिदान किया। अपने राष्ट्र के लिए सर्वस्व समर्पित कर दिया।
और ऐसे ही आज के वर्तमान युग में हमें ऐसी वीरता, ऐसा बलिदान और सर्वस्व समर्पित कर देने वाली कथाएँ मिलती हैं तो वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में देखने को मिलती हैं। जिस प्रकार सन 1925 में परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने एक संगठन की रचना कर अपने राष्ट्र के प्रति अपना देशभक्ति का गुण समर्पित किया और माँ भारती के चरणों में समर्पित हुए।
उन्होंने इतने बड़े संगठन की रचना करने के बाद भी किसी व्यक्ति या महापुरुष को अपना गुरु नहीं माना, अपितु उन्होंने उस भगवा ध्वज को गुरु बनाया जो हर वीर का प्रतीक है, हर शौर्य का प्रतीक है, हर बलिदान का प्रतीक है।
इसी के अनुरूप संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूजनीय माधव सदाशिव राव गोलवलकर जी ‘गुरुजी’, जो ज्ञान और विवेक के धनी, सरल-कोमल गुण के प्रतीक थे, उनका कहना था: “राष्ट्राय स्वाहा, इदं न मम” — यह भेंट, यह राष्ट्र सेवा, यह सेवा राष्ट्र को समर्पित है, यह मेरे लिए या मेरे परिवार के लिए नहीं है।

इन सभी गाथाओं को पढ़कर एक गाथा सागर की भी है, जो राष्ट्र को समर्पित है। भारत के विभाजन एवं आजादी के पूर्व सागर के श्रद्धेय स्वर्गीय हरिश्चंद्र जैन जी एवं ग्राम सेवन के गजाधर राव यादव जी अमृतसर पहुँचकर संघ प्रचारक निकले। राष्ट्र सेवा की भावना उनमें इतनी प्रबल थी कि वे कहते थे — “अपना जीवन सिर्फ बीड़ी भांज कर पेट भरने के लिए नहीं, देश के लिए कुछ करना चाहिए”।
राष्ट्रभक्ति की लगन ऐसी जगी कि गजाधर राव यादव जी 1941 में अमृतसर गुरुकुल में पढ़ने चले गए। कुछ समय बाद उन्होंने हरिश्चंद्र जैन जी को भी वहाँ बुला लिया। हरिश्चंद्र जी घर में बिना बताए 1941 में अमृतसर पहुँच गए।
15 अगस्त 1947 को हरिश्चंद्र जैन जी पाकिस्तान के शरणार्थी शिविर में प्रचारक के रूप में सेवा दे रहे थे। बाद में सागर में मोरारजी विद्यालय के अधीक्षक रहे।
आपातकाल 1975 की उस काली अवधि में जब लोकतंत्र को बेड़ियों में जकड़ा गया, तब सागर के हरिश्चंद्र जैन जी ‘नेताजी’ के नाम से मीसाबंदी बनकर अपने सुपुत्र सहित जेल गए। सागर की डाकू बैरक उनकी तपस्थली बनी। पर ‘नेताजी’ ने जेल को भी संस्कारशाला बना दिया।
सुबह 4 बजे से नेताजी अपने छोटे चबूतरे पर खड़े होकर सूर्यनमस्कार करते। पूरा दिन युवा मीसाबंदी 24 घंटे नेताजी के निशाने पर रहते — ‘ये करो, ये पढ़ो, टाइम का सदुपयोग करो’। जेल के अंदर भी एक भीषण जेल थी, जहाँ नेताजी सबके लिए ‘ताजी’ हुआ करते थे।
अंग्रेजी में जीरो रहने वाले युवाओं को नेताजी ने जबरजस्ती ट्यूशन लगवाकर बैंक चयन परीक्षा पास कराई। नेताजी की दूरदृष्टि से ही समय पर बीकॉम हुआ और समय पर बैंक में नौकरी लगी। सबका एक ही कहना था — ‘नेताजी न होते तो जेल जाना फलता नहीं, हम पिछड़ जाते’।
1950 में गजाधर राव यादव जी ने दो बच्चों से एक विद्यालय शुरू किया, जिसमें हरिश्चंद्र जैन जी ने भी सहयोग किया। वही विद्यालय 1953 की बसंत पंचमी को विधिवत ‘अरुण रश्मि सैनिक स्कूल’ बना।
आज हरिश्चंद्र जी के ज्येष्ठ पुत्र श्रद्धेय अरुण जी भी संघ प्रचारक के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर सेवारत हैं। पिता ने जेल की कोठरी में राष्ट्रभक्ति का बीज बोया, पुत्र आज उसी संकल्प को वटवृक्ष बना रहा है।
इनकी स्मृति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में 27 दिसंबर 2025 को गजाधर राव यादव जी के ग्राम सेवन में ‘सामाजिक समरसता सम्मेलन’ किया गया। सम्मेलन में यादव जी एवं हरिश्चंद्र जैन जी के परिवार जनों का सम्मान किया गया।
मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व गृह मंत्री, मध्य प्रदेश शासन एवं खुरई क्षेत्र के विधायक भूपेंद्र सिंह जी पधारे। उन्होंने दोनों दिवंगत प्रचारकों के त्याग को नमन करते हुए कहा — “यह धरती धन्य है जहाँ ऐसे राष्ट्रभक्त जन्म लेते हैं। ‘नेताजी’ हरिश्चंद्र जैन जी का जीवन ‘राष्ट्राय स्वाहा, इदं न मम’ का जीवंत प्रमाण है। जेल को पाठशाला बनाने वाले नेताजी की साधना ही संघ का मूल है। सामाजिक समरसता ही शताब्दी वर्ष का संदेश है।”
यह घटना सिद्ध करती है कि संघ की शक्ति प्रणेताओं की अविरल शताब्दी यात्रा कैसे व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण तक पहुँचती है। सागर से निकला एक संकल्प आज वटवृक्ष बनकर समाज को छाया दे रहा है। यही “राष्ट्राय स्वाहा, इदं न मम” की जीवंत साधना है।
लेखक शुभानन मधुसूदन खेमरिया, सागर
