मराठी के प्रतिष्ठित लेखक डॉ. वि. रा. करंदीकर द्वारा रचित यह ग्रंथ, एक युगीन दस्तावेज है। इसका हिंदी अनुवाद डॉ. मोहन बांदे ने अत्यंत सरल, सहज और प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया है, जिससे यह पुस्तक हिन्दी भाषी पाठकों के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक और पठनीय बन जाती है।
“तीन संघ चालक” यह पुस्तक सन 1925 से सन 1996 तक संघ का नेतृत्व करने वाले तीन संघ चालकों के जीवन और उनके द्वारा संघ के प्रति किए गए योगदान के बारे में बहुत ही सरल तरीके से वर्णन करती है।
संघ के प्रारंभिक काल से ही 1940 तक डॉक्टर केशव बलीराम हेडगेवार जी संघ के प्रथम संघ चालक थे।
1940 तक संघ की यात्रा में संघ की शाखा कार्य पद्धति का विकास, भगवा ध्वज को गुरु की मान्यता, संघ के 6 उत्सव का संघ में मनाया जाना, समाज में भेदभाव, जाति भेद से परे हटकर सभी हिंदू भारत माता की सहोदर संतान है, ऐसा बीजरूपित करना और समरसता के लिए काम करना। साथ ही साथ ही समाज में निर्भरता का भाव जागृत करते हुए हिंदुओं में समानता का भाव जागृत करना , संघ शिक्षा वर्ग का प्रारंभ और राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना इन सब कार्यों के प्रति डॉक्टर केशव राव बलिराम हेडगेवार जी के द्वारा अपने जीवन में किन कठिन परिस्थितियों में कार्य किया, इसका जीवंत शब्द चित्रण किया गया।
1940 से 1973 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व सर संघचालक के रूप में श्री माधव सदाशिव गोलवरकर (जिन्हे संघ में अत्यंत आदर से गुरु जी का संबोधन प्राप्त था) का कार्यकाल रहा। इनके नेतृत्व में संघ में राष्ट्र प्रेम और आध्यात्मिक भावों का मणिकांचन संयोग प्राप्त हुआ। अखंड भारत का अंतिम शिक्षा वर्ग फगवाड़ा में गुरुजी के नेतृत्व में ही संपादित हुआ। गुरु जी के सरसंघचालक के कार्यकाल में ही भारतीय जनसंघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय मजदूर संघ, विश्व हिंदू परिषद की स्थापना हुई और संघ को देश के हित में नए-नए आयाम में कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ
गुरु जी के नेतृत्व में पंडित दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख, बलराज मधोक, सुंदर सिंह भंडारी, जगन्नाथ राव जोशी, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेई, जैसे राजनीति के धुरंधर नेता देश को प्राप्त हुए। यह सभी दिग्गज नेता संघ के स्वयंसेवक के रूप में, गुरु जी के मार्गदर्शन में ही बने। द्वितीय सरसंघचालक के रूप में गुरु जी का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण रहा। यह सब कार्य आसान नहीं था। विपरीत परिस्थितियों में कार्य को सफलता के साथ काम करना आसान नहीं था। मजदूरों के हित में, राष्ट्रभक्ति जनता के लिए ,विद्यार्थियों के लिए, हिंदू समाज को जागृत और समरस करने हेतु जो संस्थाएं बनी, वह गुरु जी के दूर दृष्टि, और व्यापक विचारदर्शन का परिणाम ही है। गुरु जी के पूरे जीवन की तपस्या और सन्यासी भाव का अदबुध शब्द चित्रण इस पुस्तक में है।
तृतीय सर संघचालक के रूप में 6 जून 1973 से 11 मार्च 1994 तक श्री बाला साहब देवरस जी का कार्यकाल रहा। एकात्मता स्तोत्र जिसमें मां भारती, और मां भारती के यशस्वी संतों, वैज्ञानिकों, क्रांतिकारियों, स्वतंत्रता सैनानियों, कलाकारों, संगीत्ताज्ञों , चित्रकारों सभी को समाहित करते हुए एकातमता स्तोत्र बना। आज इसका नित्य पाठ शाखाओं में होता है।
यह कार्यकाल बहुत महत्वपूर्ण रहा। सन 1975 की आपातकाल में विपक्ष और संघ के स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी से संघ कार्य को यथावत चलाना कठिन कार्य था। फिर आपात काल के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई।
बाला साहब देवरस के कुशल नेतृत्व में बनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती, सेवा भारती, काला भारती, संस्कार भारती, ग्राहक पंचायत, भारतीय किसान संघ, सामाजिक समरसता मंच, इतिहास संकलन समिति आप के ही कार्यकाल में बनी। आपके कुशल नेतृत्व में इन संस्थाओं में काम करने हेतु योग्य और सामर्थ्यवान स्वयंसेवक निर्माण हुए।
1925 से 11 मार्च 1994 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इन तीन सर संघ चालकों का मार्गदर्शन रहा। इनका त्याग, तपस्या, संघर्ष, विचारो की विराटता को समझने हेतु इस पुस्तक को सभी राष्ट्र भक्तों को अवश्य ही पढ़ना चाहिए।
