रक्षाबंधन – रिश्तों की डोर, विश्वास का बंधन

“धागों में बंधी है प्रेम की गहराई, विश्वास की मजबूती और रक्षा का संकल्प”

श्रावण मास की शुक्ल पूर्णिमा… सावन की मस्ती में भीगा आसमान, मिठास घोले पकवानों की खुशबू और रंग-बिरंगी राखियों से सजे बाजार। यह दिन है रक्षाबंधन का – भाई-बहन के रिश्ते को अटूट विश्वास की डोर से जोड़ने वाला पर्व।

रक्षाबंधन केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह संस्कृति, परंपरा और मानवीय भावनाओं का उत्सव है, जिसमें प्रेम, सुरक्षा, समर्पण और सामाजिक जिम्मेदारी – सब एक साथ बंध जाते हैं।

‘रक्षाबंधन’ – दो शब्द, रक्षा और बंधन। रक्षा यानी सुरक्षा का वचन और बंधन यानी वह डोर जो दिलों को जोड़ दे। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रेशमी धागा (राखी) बांधकर उनके सुख और समृद्धि की कामना करती हैं, और भाई जीवनभर बहन की रक्षा का संकल्प लेते हैं।

भारतीय परंपरा में ‘सूत्र’ का खास महत्व है। जैसे माला में मोतियों को पिरोने वाला धागा सबको जोड़कर एक बना देता है, वैसे ही राखी भी रिश्तों को जोड़ने और मजबूत करने का काम करती है।

पौराणिक कथाओं से आधुनिक समाज तक:-

इन्द्र और इन्द्राणीभविष्य पुराण के अनुसार, देवासुर संग्राम में जब इन्द्र हार रहे थे, उनकी पत्नी इन्द्राणी ने श्रावण पूर्णिमा को उनके हाथ में रक्षासूत्र बांधा और विजय की कामना की। परिणामस्वरूप इन्द्र ने असुरों को परास्त किया।

महाभारत का प्रसंगशिशुपाल वध के समय कृष्ण की उंगली कट जाने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर बांध दिया। बदले में कृष्ण ने चीरहरण के समय द्रौपदी की लाज बचाई। यह ‘रक्षा के वचन’ की सबसे प्रसिद्ध मिसाल है।

राजा बलि और देवी लक्ष्मीभगवान विष्णु के बलि के राज्य में रहने पर देवी लक्ष्मी ने बलि को राखी बांधकर भाई बना लिया। प्रभावित होकर बलि ने विष्णु को बैकुंठ लौटने की अनुमति दी।

भारत में रक्षाबंधन के विविध स्वरूप :-

मुम्बई और कोंकण तट – ‘नारियल पूर्णिमा’ के रूप में समुद्र देवता को नारियल अर्पित करने की परंपरा।

बुंदेलखंड – ‘कजरी पूर्णिमा’ के दिन जौ-धान बोकर मां भगवती की पूजा।

देवीधूरा (उत्तराखंड) – पत्थर युद्ध ‘बग्वाल’ का आयोजन, देवी बाराही को प्रसन्न करने की परंपरा।

स्वतंत्रता संग्राम में रक्षाबंधन की भूमिका:-

1857 में हरियाणा के फतेहपुर गांव में रक्षाबंधन के दिन शहीद हुए गिरधर लाल की स्मृति में वर्षों तक यह पर्व नहीं मनाया गया।
1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में रवींद्रनाथ ठाकुर ने हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में रक्षाबंधन को जन-आंदोलन का हिस्सा बनाया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और रक्षाबंधन:-

संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने रक्षाबंधन को हिंदू समाज की एकता और सुरक्षा के प्रतीक पर्व के रूप में अपनाया। संघ के स्वयंसेवक इस दिन भगवा ध्वज को राखी बांधते हैं और समाज के वंचित वर्गों तक जाकर स्नेह-सूत्र का संदेश फैलाते हैं।

संघ में यह पर्व जाति, धर्म, भाषा और ऊंच-नीच के भेद मिटाकर सबको एक सूत्र में बांधने का माध्यम बनता है। सक्षम व्यक्ति समाज के कमजोर वर्ग की सुरक्षा का संकल्प ले – यही इसका मूल भाव है।

आज के दौर में रक्षाबंधन की प्रासंगिकता:-

  1. परिवारिक एकता का सूत्र – व्यस्त जिंदगी में रिश्तों को संजोने का अवसर।
  2. सामाजिक भाईचारा – सहयोग और सुरक्षा की भावना को प्रोत्साहन।
  3. महिला सशक्तिकरण – महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक।
  4. सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण – भारतीय परंपराओं का जीवंत उत्सव।
  5. आर्थिक महत्व – राखी, उपहार और मिठाइयों के कारोबार में बड़ी वृद्धि।

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं, बल्कि यह एक सामाजिक संकल्प है–

सशक्त, निर्बल की रक्षा का दायित्व उठाए।

रिश्तों में विश्वास और प्रेम कायम रहे।

सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों की रक्षा हो।

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारी ताकत हमारे रिश्तों, एकता और परस्पर सहयोग में है।

रक्षाबंधन का यह धागा प्रेम और विश्वास की वह डोर है, जो पीढ़ियों से जुड़ी है और आने वाले समय में भी समाज को जोड़ती रहेगी। चाहे समय कितना भी बदल जाए, यह पर्व हमें यह सिखाता रहेगा कि –
“जो रक्षा का वचन देता है, वही सच्चा रिश्तों का मान रखता है।”

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