भारतीय समाज के सामने आज जो संकट खड़ा है, वह केवल बदलती जीवन-शैली का प्रश्न नहीं है, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक और चरित्रगत परिवर्तन है। पिछले कुछ दशकों में समाज के भीतर जिस प्रकार यौन स्वच्छंदता, विवाह संस्था का अवमूल्यन, कैजुअल संबंध, लिव-इन रिलेशनशिप और LGBTQ जैसे विमर्शों को सामान्य बनाने का प्रयास हुआ है, वह भारतीय सभ्यता के मूल स्वरूप से मेल नहीं खाता। यह परिवर्तन स्वाभाविक नहीं बल्कि विचारधारात्मक और सांस्कृतिक प्रभावों के माध्यम से धीरे-धीरे आरोपित होता दिखाई देता है।
भारतीय सभ्यता में काम को कभी पाप नहीं माना गया। जीवन के चार पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — भारतीय जीवन दर्शन की आधारशिला हैं। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10.129) में कहा गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति “काम” से हुई — “कामो हृदि प्रथमं जायते”। यह स्पष्ट करता है कि भारतीय परंपरा में काम को सृजन का आधार माना गया है, न कि पाप का कारण। बृहदारण्यक उपनिषद (6.4.3) में दाम्पत्य संबंध को सृष्टि विस्तार का माध्यम बताया गया है। वात्स्यायन कृत कामसूत्र में स्पष्ट कहा गया है कि काम धर्म और अर्थ के अधीन होना चाहिए, अर्थात काम का उद्देश्य केवल भोग नहीं बल्कि संतुलित जीवन है।
मनुस्मृति (3.56) में कहा गया है — “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:” अर्थात जहाँ स्त्री का सम्मान होता है वहाँ देवत्व का वास होता है। यह दृष्टि भारतीय सभ्यता की स्त्री के प्रति सम्मानजनक दृष्टि को दर्शाती है। विवाह को संस्कार माना गया, न कि केवल अनुबंध। परिवार समाज की मूल इकाई रहा। यही कारण है कि भारतीय समाज हजारों वर्षों तक स्थिर बना रहा।
इसके विपरीत क्रिश्चियनिटी रिलिजन में यौन संबंधों को लेकर दृष्टिकोण नियंत्रित और पाप-केंद्रित रहा। बाइबल के Genesis 2:22 में स्त्री को पुरुष की पसली से उत्पन्न बताया गया है। Genesis 3:16 में स्त्री को पुरुष के अधीन रहने की बात कही गई है। New Testament में 1 Corinthians 6:18 में लिखा है — “Flee from sexual immorality” अर्थात यौन अनैतिकता से दूर रहो। Hebrews 13:4 में विवाह के बाहर संबंधों को अनैतिक बताया गया है।
पश्चिमी समाज में लंबे समय तक यौन विषयों पर दमनकारी दृष्टिकोण रहा। इसी दमन के परिणामस्वरूप 1960 के दशक में तथाकथित Sexual Revolution हुई। इसके बाद विवाह से बाहर संबंध, कैजुअल सेक्स और यौन स्वतंत्रता को आधुनिकता के रूप में प्रस्तुत किया गया। अमेरिका में 1960 में विवाह के बाहर जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या लगभग 5 प्रतिशत थी, जो 2020 तक 40 प्रतिशत से अधिक हो गई। यूरोप के कई देशों जैसे फ्रांस, स्वीडन और नॉर्वे में विवाह के बाहर जन्म दर 50 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।
अब यही सांस्कृतिक मॉडल भारत में भी आयातित किया जा रहा है। भारत में विवाह आयु लगातार बढ़ रही है। NFHS-5 (2019-21) के अनुसार महिलाओं की औसत विवाह आयु 22 वर्ष से अधिक हो गई है और शहरी क्षेत्रों में यह 25 वर्ष तक पहुँच रही है। पुरुषों में विवाह आयु 28-30 वर्ष तक पहुँच चुकी है। विवाह में देरी के साथ-साथ कैजुअल संबंधों और अस्थायी रिश्तों की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
मीडिया और मनोरंजन उद्योग ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पिछले एक दशक में वेब सीरीज और फिल्मों में विवाह से बाहर संबंध, लिव-इन रिलेशनशिप और बहु-संबंधों को सामान्य रूप से प्रस्तुत किया गया। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यौन सामग्री की उपलब्धता ने सामाजिक व्यवहार को प्रभावित किया।
LGBTQ विमर्श भी इसी परिवर्तन का हिस्सा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने Navtej Singh Johar बनाम भारत सरकार मामले में धारा 377 को निरस्त किया। इसके बाद LGBTQ विमर्श को संस्थागत समर्थन मिलने लगा। Naz Foundation और Humsafar Trust जैसे संगठन इस विषय पर सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं।
आज 100 से अधिक जेंडर की अवधारणा प्रस्तुत की जा रही है। यह जैविक आधार के बजाय पहचान आधारित अवधारणा है।
लिव-इन रिलेशनशिप को भी न्यायालय ने कई मामलों में वैधता दी है। Indra Sarma बनाम V.K.V Sarma (2013) में सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन संबंधों को मान्यता दी। इससे विवाह संस्था का महत्व कम होने लगा है।
इसके साथ ही सामाजिक व्यवहार में भी परिवर्तन दिखाई दे रहा है। यौन विषयों को सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनाया जा रहा है। भाषा, सोशल मीडिया और मनोरंजन में संबंधों की मर्यादा घट रही है।
यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं बल्कि सांस्कृतिक परिवर्तन है।
भारतीय सभ्यता प्रेम, शौर्य और ज्ञान पर आधारित रही है। संयम, मर्यादा और संतुलन भारतीय समाज की पहचान रहे हैं।आज आवश्यकता है कि समाज इन परिवर्तनों को समझे और अपने सांस्कृतिक मूल्यों को पुनः स्थापित करे।
संघर्ष आधुनिकता और परंपरा का नहीं है।
संघर्ष सभ्यता और असभ्यता के बीच है।

