जैविक और प्राकृतिक कृषि से राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव – विनोद दिनेश्वर

जबलपुर। भाद्रपद कृष्ण षष्ठी पर भगवान बलराम जी के जन्मोत्सव के अवसर पर गुरुवार को शासकीय मानकुंवर बाई कला एवं वाणिज्य स्वशासी महिला महाविद्यालय में “श्री बलराम प्राकट्योत्सव” का भव्य आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम आयुक्त, उच्च शिक्षा, भोपाल के आदेशानुसार महाविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ एवं हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ।

मुख्य अतिथि के रूप में महाकौशल प्रांत के प्रांत प्रचार प्रमुख श्री विनोद कुमार दिनेश्वर उपस्थित रहे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. स्मृति शुक्ला ने की। कार्यक्रम की रूपरेखा भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ के संयोजक डॉ. नोएल दान एवं सह संयोजक डॉ. नुपूर निखिल देशकर के मार्गदर्शन में तैयार की गई। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ जिसमें मुख्य अतिथियों ने भगवान बलराम के तैलीय चित्र और माँ सरस्वती के विग्रह पर माल्यार्पण करके किया। कार्यक्रम के प्रारंभ में डॉ. नुपूर निखिल देशकर द्वारा कार्यक्रम की भूमिका रखी गई।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता  ने कहा कि भगवान बलराम जी केवल पौराणिक पात्र या श्रीकृष्ण के अग्रज भर नहीं थे, बल्कि वे भारत के आदि कृषक, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षक और ग्राम्य जीवन के संवाहक थे। उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक युग में, जब कृषि क्षेत्र में अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के शोषणकारी और स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाले कृषि उत्पाद बाजार पर हावी हैं, तब हमें अपने कृषि तंत्र को आत्मनिर्भर बनाना ही सच्ची स्वतंत्रता है। यह केवल अन्न उत्पादन का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का प्रश्न भी है।

दिनेश्वर जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा— “यदि हम विदेशी रासायनिक उर्वरकों और संकर बीजों पर निर्भर रहेंगे, तो हम न केवल अपनी भूमि की उर्वरता खो देंगे, बल्कि अपनी पीढ़ियों के स्वास्थ्य और स्वतंत्रता को भी गिरवी रख देंगे।”

उन्होंने बताया कि आधुनिक कृषि पद्धतियों ने पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ा है और मानवीय जीवन में घातक रोगों को जन्म दिया है। इसके विपरीत, भगवान बलराम के जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि प्रकृति के साथ सहजीवी संबंध बनाकर ही हम समृद्ध और स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते हैं।

उन्होंने छात्राओं से आह्वान किया कि आज के इस विशेष दिन पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए, प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करेंगे और जैविक व प्राकृतिक कृषि को जीवन का हिस्सा बनाएंगे। यही मार्ग हमारे समाज और राष्ट्र को सतत विकास की ओर ले जाएगा।

अपने उद्बोधन के अगले चरण में उन्होंने भारत के विभाजन की विभीषिका का उल्लेख करते हुए भावनात्मक अंदाज में स्वतंत्रता पूर्व का चित्र खींचा। उन्होंने बताया कि किस प्रकार विभाजन ने करोड़ों परिवारों को उजाड़ा, असंख्य जानें लीं और हमारी सांस्कृतिक एकता पर गहरा घाव किया। उन्होंने ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ और ‘अखंड भारत’ के महत्व को रेखांकित किया और छात्राओं से आह्वान किया कि वे स्वतंत्रता का सही मूल्य समझें, क्योंकि यह केवल इतिहास का प्रसंग नहीं, बल्कि आज और कल की सुरक्षा की नींव है।

महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ स्मृति शुक्ला ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि हरिवंश पुराण, श्रीमद्भगवद्गीता में आपके उत्कृष्ट चरित्र के कई प्रसंग मिलते है। भगवान बलराम को सूरदास जी ने अपने काव्य में बलदाऊ के शब्द के रूप में स्थान दिया है। भगवान बलराम ने भी भीम और दुर्योधन दोनों को गदा विद्या दी थी। क्योंकि वह परिवार की एकता के पक्षधर थे युद्ध के नहीं इसलिए उन्होंने महाभारत युद्ध में किसी भी पक्ष को युद्ध क्षेत्र में सहयोग नहीं दिया।

कार्यक्रम में प्रारंभ से लेकर अंत तक संगीत विभाग की छात्रा कु अंजली विश्वकर्मा, कु खुशी, कु सखी जैन, कु अदिति पटेल ने डा. उज्ज्वला आयाचित और संगीत विभाग के शिक्षकों के मार्गदर्शन में सरस्वती वंदना, स्वागत गीत और भजनों की सुमधुर प्रस्तुतियाँ दी गई। कार्यक्रम का संचालन ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ की सह प्रभारी एवं संगीत विभाग की प्रभारी विभाग अध्यक्ष डॉ नुपूर निखिल देशकर ने किया। आभार प्रदर्शन ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ के प्रभारी डॉ नोएल दान द्वारा किया गया। कार्यक्रम में डॉ प्रियदर्शन, डॉ सपना चावला ,डॉ उज्ज्वल खरपाटे, डॉ सुषमा मेहरा, डॉ सपना चौहान, डॉ विजय कोष्टा, डॉ अर्चना चतुर्वेदी, डॉ अरुण, डॉ अभिषेक, डॉ बीएल अर्मौ, डॉ ब्रम्हानंद, डॉ आरिफ, डॉ उषा कैली ,डॉ अर्चना सिंह के साथ लगभग 70 छात्राओं की उपस्थिति रही।

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