भारतीय संस्कृति का मूल भाव रहा है – “वसुधैव कुटुंबकम्”। यह केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानने का अद्वितीय संदेश है। जब हम समस्त विश्व को परिवार मानते हैं, तब उसमें न केवल मानवीय बंधुत्व की भावना प्रकट होती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, वैश्विक समरसता और सुरक्षित भविष्य की राह भी प्रशस्त होती है। भारत में प्राचीन काल से व्यक्ति की बजाय परिवार को समाज और राष्ट्र की आधारभूत इकाई माना गया। परिवार ही वह स्थान रहा जहाँ संस्कार, मूल्य और कर्तव्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सहज रूप से हस्तांतरित होते रहे।
किन्तु यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या भारतीय परिवार आज सुप्तावस्था में है? वस्तुतः ऐसा नहीं है, परंतु दीर्घकाल से हुए आक्रमणों, औपनिवेशिक शासन और आधुनिक जीवनशैली के कारण पारिवारिक मूल्यों का क्षरण अवश्य हुआ है। परिवारों का विघटन और परंपराओं की टूटन ने पीढ़ियों के बीच की श्रृंखला को कमजोर किया है। यही कारण है कि आज समाज में असुरक्षा, अलगाव, अवसाद, ईर्ष्या और अनियंत्रित प्रतिस्पर्धा जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। आत्महत्याओं की बढ़ती संख्या और भावनात्मक कमी इस विघटन का स्पष्ट परिणाम है।
क्या है कुटुंब प्रबोधन?
कुटुंब प्रबोधन का अर्थ है—परिवार में जागरण या प्रबोधन की वह प्रक्रिया जिसमें प्रेम, दायित्वबोध, संस्कार और सामूहिक उत्तरदायित्व का पुनर्स्थापन हो। यह केवल पारिवारिक बंधन की मजबूती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें तीन प्रमुख आयाम सम्मिलित हैं—
शैक्षिक आयाम – परिवार को ‘प्रथम विद्यालय’ मानते हुए बच्चों को संस्कार, जीवन-कौशल और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देना।
सामाजिक आयाम – परिवार और समाज को एक-दूसरे का सहायक बनाना, परस्पर सहयोग और उत्तरदायित्वबोध की संस्कृति विकसित करना।
आध्यात्मिक आयाम – संतुलित जीवनशैली, आत्मीयता और कर्तव्यबोध को व्यवहार में उतारना, तथा वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को विश्व स्तर तक ले जाना।
इस प्रकार कुटुंब प्रबोधन केवल विचार नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कार्यशैली है। इसके माध्यम से परिवार पुनः एक जीवंत संस्था बन सकता है, जो अपने सदस्यों के साथ-साथ समाज और राष्ट्र का भी मार्गदर्शन करे।
चुनौतियाँ
आज भारतीय समाज जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, उनमें बढ़ती आत्महत्याएँ, भावनात्मक विखंडन, भौतिकतावाद, पारिवारिक विघटन और समुदाय से दूरी प्रमुख हैं। पड़ोसी या समुदाय की समस्याएँ अब व्यक्तिगत उत्तरदायित्व न रहकर राज्य की जिम्मेदारी मान ली जाती हैं। परिणामस्वरूप, वह सामाजिक सह-अस्तित्व और पारस्परिक सहयोग की संस्कृति, जो भारतीय परिवारों की पहचान रही, क्षीण हो गई है।
आदरणीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी का कथन इस संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक है। उन्होंने कहा है— “परिवार के लोग दिन में एक बार साथ मिलकर भोजन करें, परिवार के अंदर अपनी मातृभाषा का प्रयोग हो, हमारी वेशभूषा हमारे संस्कारों को प्रदर्शित करने वाली हो, हमारा भवन ऐसा हो जो लगे यह एक आदर्श हिन्दू घर है। हम स्वयंसेवक इन विषयों को लेकर समाज में बढ़ रहे हैं, समाज को आज इन विषयों की जानकारी की, जागरूकता की आवश्यकता है। परिवार के सदस्यों में एक दूसरे के प्रति दायित्व की अनुभूति रहे। धीरे-धीरे यह विषय समाज में बढ़ता जाए और एक आदर्श परिवार की संकल्पना साकार हो।” कुटुम्ब प्रबोधन के कार्य को 6 बिंदुओं- भजन, भोजन, भवन, भाषा, भूषा और भ्रमण के आधार पर चलने की बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा कि परिवार की आत्मीयता की परंपरा बनी रहनी चाहिए।
यह उद्धरण स्पष्ट करता है कि कुटुंब प्रबोधन केवल सैद्धांतिक विमर्श नहीं, बल्कि दैनिक जीवन की व्यवहारिक संरचना का हिस्सा होना चाहिए।
यदि भारत को आत्मनिर्भरता और आध्यात्मिक समृद्धि के साथ मूल्य-संपन्न राष्ट्र बनाना है, तो कुटुंब प्रबोधन को सामाजिक आंदोलन का रूप देना होगा। इसके लिए—परिवारों में प्रतिदिन सामूहिक भोजन और संवाद की परंपरा स्थापित की जाए। बच्चों और युवाओं को सांस्कृतिक अनुष्ठानों और उत्सवों में सक्रिय रूप से सम्मिलित किया जाए। बुजुर्गों की देखभाल को केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि धरोहर मानकर उनके अनुभव से समाज का मार्गदर्शन लिया जाए। शिक्षा और मीडिया में पारिवारिक मूल्यों तथा वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को विशेष स्थान दिया जाए।
स्पष्ट है कि कुटुंब प्रबोधन केवल किसी संगठन तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण देश और मानवता की आवश्यकता है। यह जीवन की एक कार्यशैली है, जिसमें व्यक्ति न केवल अपने परिवार बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति भी जिम्मेदारी अनुभव करता है। जब प्रत्येक सदस्य स्वयं को एक अच्छा पिता, पुत्र, पुत्री, पति, पत्नी और नागरिक के रूप में विकसित करेगा, तब प्रेम, सम्मान और गरिमा समाज में स्वाभाविक रूप से पुनर्स्थापित होंगे। यही कुटुंब प्रबोधन का वास्तविक उद्देश्य है, जो अंततः वसुधैव कुटुंबकम् की वैश्विक भावना को मूर्त रूप प्रदान कर सकता है।
-दीपक द्विवेदी
