श्री एकनाथ रानाडे का जन्म 19 नवम्बर, 1914 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के टिमटाला गाँव में हुआ। उनके पिता श्री रामकृष्णराव विनायक रानाडे रेलवे विभाग में कार्यरत थे तथा माता रमाबाई पुणे के बर्वे परिवार से थीं। आठ भाई-बहनों में सबसे छोटे एकनाथ को परिवार में स्नेहपूर्वक “नाथ” कहा जाता था। बचपन से ही वे बुद्धिमान, जिद्दी और शरारती स्वभाव के थे।
सन् 1921 में वे अपने बड़े भाई बाबूराव के पास नागपुर आ गए। यहीं उनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई। उनके बहनोई अन्नाजी सोहोनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए थे। इसी कारण बालक नाथ का परिचय डॉ. हेडगेवार और संघ की शाखा से हुआ। 1926 में उन्होंने पहली बार शाखा में भाग लिया और यही उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ।
1932 में उन्होंने नागपुर से मैट्रिक उत्तीर्ण किया। यद्यपि वे तुरंत प्रचारक बनना चाहते थे, किंतु डॉ. हेडगेवार ने उन्हें पहले उच्च शिक्षा प्राप्त करने की सलाह दी। उन्होंने 1936 में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और तत्पश्चात पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समर्पित हो गए।
संघ जीवन और संगठनात्मक कौशल
1938 में उन्हें महाकौशल प्रांत का कार्य सौंपा गया। उन्होंने वहाँ सागर विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की पढ़ाई भी पूरी की। अद्भुत स्मरणशक्ति और संगठन क्षमता के कारण वे शीघ्र ही संघ के शीर्ष नेतृत्व में स्थान पाने लगे।
1945 में वे मध्यप्रदेश के प्रांत प्रचारक बने। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के पश्चात संघ पर लगे प्रतिबंध के दौरान उन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन किया। उनकी रणनीति और नेतृत्व से 80,000 से अधिक स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह में भाग लिया। अंततः सरकार को प्रतिबंध हटाना पड़ा।
1950 में उन्हें पूर्वोत्तर भारत का दायित्व सौंपा गया। यहाँ उन्होंने विभाजन से विस्थापित लोगों की सहायता हेतु वास्तु सहायता समिति का गठन किया। 1953 में उन्हें अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख और 1956 में संघ का सरकार्यवाह नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में संघ ने अनुशासन, संगठन और वित्तीय स्थिरता प्राप्त की।
विवेकानंद शिला स्मारक : अदम्य संकल्प का उदाहरण
1962 में चीन युद्ध के बाद देश में निराशा का वातावरण था। ऐसे समय में युवाओं को जागृत करने हेतु स्वामी विवेकानंद की स्मृति में कन्याकुमारी की समुद्र-शिला पर स्मारक बनाने का निर्णय हुआ। इस महती योजना की जिम्मेदारी एकनाथ रानाडे को दी गई।
यह कार्य अत्यंत कठिन था। स्थानीय ईसाई मिशनरियों ने विरोध किया, राज्य और केंद्र सरकार ने भी अनेक अड़चनें डालीं। परंतु रानाडे जी की दृढ़ता और धैर्य ने सभी अवरोधों को परास्त किया। उन्होंने पूरे देश से सहयोग जुटाया। प्रत्येक विद्यार्थी से एक-एक रुपया एकत्र करने का अभिनव अभियान चलाया। राज्य सरकारों, नगरपालिकाओं, उद्योगपतियों और साधारण जन से चंदा एकत्र कर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर लोकसहभागिता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।
वर्ष 1970 में राष्ट्रपति वी.वी. गिरि द्वारा विवेकानंद शिला स्मारक का उद्घाटन हुआ। आज यह स्मारक केवल वास्तुकला की दृष्टि से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और संगठन-शक्ति के प्रतीक के रूप में खड़ा है।
विवेकानंद केन्द्र की स्थापना
रानाडे जी का मानना था कि स्मारक केवल पत्थरों का ढांचा न रहकर एक जीवंत चेतना बने। इसी उद्देश्य से 1972 में उन्होंने विवेकानंद केन्द्र की स्थापना की। यह केन्द्र स्वामी विवेकानंद के आदर्शों पर आधारित सेवा, शिक्षा और संस्कार का आंदोलन है।
विवेकानंद केन्द्र के जीवनव्रती (पूर्णकालिक कार्यकर्ता) आज भी उत्तर-पूर्व भारत, आदिवासी क्षेत्रों और दुर्गम इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास और राष्ट्रीय एकता का कार्य कर रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश में आवासीय विद्यालयों की स्थापना, युवाओं के लिए प्रशिक्षण शिविर, महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक जागरण इस संगठन के प्रमुख कार्य हैं।

व्यक्तित्व और कार्यशैली
श्री एकनाथ रानाडे अत्यंत समयनिष्ठ और परिश्रमी थे। उन्होंने 25,000 से अधिक पत्र लिखे, जिनसे उनके संगठन कौशल, योजनाबद्ध कार्यशैली और अनुशासन का परिचय मिलता है। वे कठिनाइयों से कभी घबराए नहीं। उनका विश्वास था कि दृढ़ इच्छाशक्ति और संगठन के सहयोग से असंभव भी संभव हो जाता है।
उनकी अद्भुत स्मरणशक्ति ऐसी थी कि एक बार किसी से मिलने के बाद वे उसका नाम और संदर्भ जीवन भर याद रखते। वे अध्ययनशील भी थे और विशेष रूप से स्वामी विवेकानंद के साहित्य से उन्होंने प्रेरणा ली।
लगातार परिश्रम और व्यस्तता ने उनके स्वास्थ्य को प्रभावित किया। 1980 में उन्हें गंभीर आघात लगा जिससे उनकी स्मरणशक्ति और दृष्टि प्रभावित हुई, किंतु उन्होंने कार्य गति कम नहीं की।
22 अगस्त 1982 को चेन्नई (मद्रास) में उन्हें घातक हृदयाघात हुआ और उनका देहांत हो गया। उनका अंतिम संस्कार कन्याकुमारी में सूर्यास्त के समय शिला स्मारक के समीप हुआ।
श्री एकनाथ रानाडे का जीवन संगठन, संकल्प और सेवा का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को संगठित कर नई ऊर्जा दी, विवेकानंद शिला स्मारक का निर्माण कर राष्ट्रीय चेतना को मूर्त रूप दिया, और विवेकानंद केन्द्र के माध्यम से सेवा-कार्य की नई धारा प्रवाहित की।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि यदि संकल्प पवित्र और अटल हो, तो असंभव भी संभव हो जाता है। आज कन्याकुमारी में खड़ा विवेकानंद शिला स्मारक और देशभर में चल रही विवेकानंद केन्द्र की गतिविधियाँ उनके अदम्य परिश्रम और त्याग की अमर स्मृतियाँ हैं।
