अद्वितीय साहस, शौर्य और पराक्रम की प्रतिमूर्ति : वीरांगना रानी दुर्गावती

5 अक्टूबरजयंती विशेष

 “जब नारी ने रणभूमि में डेरा डाला,

तो अधर्म का अंधकार स्वयं मिट गया।

जहाँ दुर्गा अवतरित होती हैं, वहीं से विजय का प्रभात होता है।”

भारतभूमि केवल ऋषियों और मुनियों की ही नहीं, बल्कि ऐसी वीरांगनाओं की भी जननी रही है जिन्होंने अपने शौर्य, त्याग और मातृभूमि-भक्ति से इतिहास को अमर कर दिया। इन्हीं में एक तेजस्विनी नाम है- माँ दुर्गा की अवतार, गोंडवाना की गौरवगाथा- रानी दुर्गावती जी।

16 वीं शताब्दी का वह काल जब भारत में मुगल आक्रांताओं का आतंक व्याप्त था, तब महाकौशल की इस वीरांगना ने अपने अद्वितीय साहस और युद्धनीति से यह सिद्ध किया कि नारी केवल करुणा की नहीं, अपितु पराक्रम की प्रतिमूर्ति भी है। रानी दुर्गावती ने न केवल गोंडवाना की मर्यादा की रक्षा की, बल्कि भारतीय नारीत्व को वह ऊँचाई दी जो आज भी युगों-युगों तक प्रेरणा देती रहेगी।

उनका जीवन एक ऐसी गाथा है जिसमें शक्ति और संस्कार, धर्म और राष्ट्र, त्याग और नेतृत्व का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उनकी तलवार केवल शत्रु के विनाश का साधन नहीं थी, बल्कि मातृभूमि की मर्यादा और स्वाभिमान की रक्षा का प्रतीक थी।

आज जब राष्ट्र उनकी 500वीं जयंती मना रहा है, तब यह अवसर केवल स्मरण का नहीं, बल्कि संकल्प का भी है-

कि हम उस भारत का निर्माण करें जिसकी नींव रानी दुर्गावती जैसी वीरांगनाओं के परिश्रम, त्याग और संस्कृति पर रखी गई थी।

भारतभूमि के गौरवशाली इतिहास में जब-जब मातृभूमि पर संकट आया है, तब-तब नारी शक्ति ने अपनी अजेय प्रतिभा और अदम्य साहस से इतिहास के पृष्ठों को अमर कर दिया है। ऐसी ही एक अमर विभूति हैं- वीरांगना रानी दुर्गावती, जिन्होंने अपने शौर्य, पराक्रम, नीति, करुणा और राष्ट्रनिष्ठा से गोंडवाना साम्राज्य को स्वर्णयुग प्रदान किया।

वीरभूमि से उदित हुई अद्भुत तेजस्विनी

5 अक्टूबर 1524 (अष्टमी तिथि, पुनर्वसु नक्षत्र), बुंदेलखंड की वीरभूमि कालिंजर के चंदेल राजवंश में राजा कीर्तिसिंह चंदेल के घर एक दिव्य बालिका का जन्म हुआ। कन्या का नाम रखा गया- दुर्गावती, माँ दुर्गा के स्वरूप की साक्षात प्रतिमा। पिता के संस्कारों में पली-बढ़ी दुर्गावती ने शस्त्र-विद्या, घुड़सवारी और रणकौशल में अद्भुत निपुणता प्राप्त की।

सन 1542 में उनका विवाह गोंडवाना साम्राज्य के शासक दलपत शाह गोंड से हुआ। यह विवाह केवल दो राजवंशों का नहीं, बल्कि आर्य और अनार्य संस्कृतियों के समरस संगम का प्रतीक था। दुर्भाग्यवश विवाह के छह वर्ष बाद ही दलपत शाह का निधन हो गया, तब रानी ने अपने नन्हे पुत्र वीर नारायण की ओर से गोंडवाना की गद्दी संभाली और एक कुशल शासिका के रूप में इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।

गोंडवाना का स्वर्णयुग

रानी दुर्गावती के सोलह वर्षीय शासनकाल ने गोंडवाना को समृद्धि, सुरक्षा और सांस्कृतिक वैभव का केंद्र बना दिया। उस काल में गोंडवाना साम्राज्य में 70 हजार गाँवों की संख्या बढ़कर 80 हजार हो गई। शासन की नीति न्यायपूर्ण, प्रशासन सुव्यवस्थित और प्रजा सुखी थी। भूमि का लगान स्वर्ण मुद्राओं में दिया जाता था- यह उस समृद्धि का प्रतीक था जो रानी की दूरदर्शिता और सुशासन से उपजी थी।

वे न्यायप्रिय और प्रजावत्सला शासिका थीं। नारी सम्मान की रक्षा उनके राज्य का सर्वोच्च धर्म था। उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए अनेक योजनाएँ आरंभ कीं- लाख के आभूषणों के उद्योग, महुआ और जड़ी-बूटी के व्यापार, और वन संसाधनों से रोजगार सृजन की नीति आज भी अनुकरणीय है।

पर्यावरण और जल प्रबंधन की प्रणेता

रानी दुर्गावती केवल योद्धा ही नहीं, एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाली पर्यावरणविद् भी थीं। उन्होंने अपने साम्राज्य में लगभग 1000 तालाब और 500 बावलियों का निर्माण कराया। जबलपुर (त्रिपुरी) क्षेत्र में 52 सरोवर और 40 बावलियाँ आज भी उनके जल प्रबंधन कौशल की साक्षी हैं।

उनकी जल व्यवस्था तीन प्रकार की थी-

शिखर सरोवर (वन्यजीवों हेतु),

तराई सरोवर (जल संग्रहण हेतु),

और नगरीय सरोवर (जन उपयोग हेतु)।

ये सभी सरोवर भूमिगत रूप से एक-दूसरे से जुड़े थे- यह वही अवधारणा है जिस पर आज भारत सरकार की केन-बेतवा लिंक परियोजना आधारित है।

सनातन धर्म की अधिष्ठात्री

रानी दुर्गावती की शासन-नीति का केंद्र था- “धर्म, संस्कृति और राष्ट्र।” उन्होंने सनातन परंपराओं को संरक्षण और प्रोत्साहन दिया। अनेक मंदिरों, मठों, धर्मशालाओं का निर्माण कराया, संस्कृत पंडितों और कवियों को आश्रय दिया, और संस्कृत शिक्षा का प्रसार किया। वे इस तथ्य की जीती-जागती मिसाल थीं कि धर्म और प्रशासन- जब एकता में बंधे हों, तो राज्य स्वर्ग समान बन जाता है।

मुगलों से संघर्ष और बलिदान

गोंडवाना की समृद्धि ने मुगल सम्राट अकबर का ध्यान आकर्षित किया। उसने अपने सेनापति आसफखां को 10 हजार घुड़सवार सेना, तोपों और बारूद के साथ भेजा और रानी से अधीनता स्वीकारने का प्रस्ताव दिया।

रानी ने मातृभूमि और धर्म की रक्षा के लिए वह प्रस्ताव ठुकरा दिया। उन्होंने रणक्षेत्र में माँ दुर्गा का रूप धारण किया-

“थर-थर दुश्मन कांपे, पग-पग भागे अत्याचार,

नरमुंडों की झड़ी लगाई, लाशें बिछीं अपार।”

परंतु जब घोर युद्ध में वे गंभीर रूप से घायल हुईं, तब उन्होंने मुगलों के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय 24 जून 1564 को नरई नाले के तट पर अपनी छाती में कटार भोंककर वीरगति प्राप्त की। यह वही स्थल है जो आज जबलपुर जिले में स्थित है और राष्ट्र के तीर्थों में गिना जाता है।

इतिहासकारों की दृष्टि में रानी दुर्गावती

ब्रिटिश इतिहासकार विंसेंट स्मिथ ने लिखा-

“उत्तम चरित्र वाली इस रानी पर अकबर का आक्रमण अन्यायपूर्ण अत्याचार था।”

फारसी इतिहासकार फरिश्ता ने रानी की प्रशंसा करते हुए कहा-

“उनका अंत उतना ही महान और उज्ज्वल था, जितना उनका जीवन।”

निस्संदेह, रानी दुर्गावती ने सिद्ध किया कि नारी केवल करुणा नहीं, पराक्रम की प्रतिमूर्ति भी है।

उपासना और प्रेरणा का प्रतीक

रानी दुर्गावती केवल इतिहास नहीं, जीवंत प्रेरणा हैं- नारी शक्ति, राष्ट्रभक्ति, सुशासन और पर्यावरण चेतना का अद्भुत संगम। वे बताती हैं कि सच्ची शक्ति वही है जो धर्म और मातृभूमि की रक्षा के लिए समर्पित हो।

आज जब भारत अपनी सभ्यता की जड़ों की ओर पुनः लौट रहा है, तब रानी दुर्गावती जैसी विभूतियों का स्मरण हमारे राष्ट्र चरित्र को सुदृढ़ करता है।

“वीरांगना रानी दुर्गावती-

भारत की बेटी, गोंडवाना की गौरवगाथा,

और सनातन संस्कृति की अमर प्रहरी।”

पूजा रजक
(अधिवक्ता, म.प्र. हाईकोर्ट जबलपुर व सचिव, वनवासी कल्याण आश्रम जबलपुर महानगर)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *