छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026
बहुप्रतीक्षित छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 का उद्देश्य बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या गलत जानकारी देकर कराए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना है। धर्म स्वातंत्र्य विधेयक के जरिये विष्णुदेव साय सरकार ने धर्मांतरण को रोकने का हर संभव प्रयास किया है। यह विधेयक छत्तीसगढ़ के मूल स्वभाव और स्वरूप को बचाए रखने में बेहद मददगार साबित होगा। इसके अलावा जल, जंगल और जमीन से जुड़े आदिवासी तबके के लिए मजबूत संबल बनेगा। वहीं संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण में इसकी बड़ी भूमिका होगी। इस विधेयक को लेकर छत्तीसगढ़ का एक बड़ा और विचारशील तबका खुश है और सार्वजनिक मंचों पर इसे व्यक्त भी कर रहा है। आइए जानते हैं इस विधेयक का असर और प्रावधान…।
कानून लागू होने के बाद प्रावधान
इस कानून के लागू होने के बाद प्रत्येक धर्मांतरण के लिए पूर्व सूचना और पंजीयन अनिवार्य हो जाएगा, यहां तक कि धर्मपरिवर्तन कराने वाले को न केवल पंजीयन करना होगा बल्कि हर साल अपनी संपत्ति घोषित करनी होगी। इस कानून में न्यूनतम सात साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान रखा गया है। इसी तरह न्यूनतम 5 लाख से लेकर 25 लाख रुपए तक अर्थदंड की सजा का भी प्रावधान किया गया है।
विधेयक की खास बातें
• घर वापसी को नहीं माना जाएगा धर्मांतरण
• केवल विवाह के लिए धर्मांतरण मान्य नहीं
• दो या दो से अधिक लोगों को माना जाएगा सामूहिक धर्मांतरण
• धर्म परिवर्तन करने और कराने वाले दोनों को देनी होगी सूचना
• धर्मांतरण कराने वालों को करनी होगी संपत्ति की घोषणा
• सार्वजनिक सूचना का होगा प्रकाशन, दावा-आपत्ति के लिए 30 दिन
• अवैध धर्मांतरण की जांच 30 दिनों में करनी होगी पूरी
• धर्मांतरण के 21 दिनों के भीतर प्रमाण पत्र लेना जरूरी
• आवेदन के 90 दिन बाद धर्मांतरण तो अमान्य
घर वापसी की प्रक्रिया
घर वापसी की भी प्रक्रिया तय: पैतृक धर्म/आस्था में वापस लौटने के पहले या बाद में सक्षम प्राधिकारी को सूचना देना होगा। इसके बाद उस व्यक्ति का पूर्व में जारी धर्मांतरण प्रमाणपत्र रद्द करने का आदेश जारी किया जाएगा। ऐसे में मामले जिनमें धर्मांतरण का प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया है, उसमें वापस लौटने का आदेश जारी कर उसका प्रकाशन किया जाएगा।
सजा और दंड प्रावधान
प्रलोभन देकर धर्मांतरण पर 10 वर्ष तक की सजा: प्रलोभन, महिमामंडन और षडयंत्र पूर्वक धर्मांतरण का दोषी पाए जाने पर न्यूनतम 7 और अधिकतम 10 साल की सजा और पांच लाख रुपए जुर्माना हो सकता है। प्रार्थी के नाबालिग, मानसिक रूप से कमजोर, एससी एसटी की स्थिति में 10 से 20 साल तक की सजा और न्यूनतम 10 लाख जुर्माना हो सकता है।
मुआवजा प्रावधान
धर्मांतरित को मुआवजे का भी प्रावधान: कानून में प्रलोभन देकर या जबरन धर्मांतरण की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति के लिए मुआवजा का भी प्रावधान किया गया है। यह राशि अधिकतम 10 लाख रुपए तक हो सकती है।
सामाजिक प्रभाव
आस्था नहीं सामाजिक संतुलन पर भी खतरा: कनवर्जन की प्रक्रिया अंत में स्थानीय स्तर पर सामाजिक विभाजन तक पहुंच रहा है। यह स्थिति विभिन्न क्षेत्रों में समान रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि राज्य में कनवर्जन का प्रश्न केवल आस्था परिवर्तन का विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह सामाजिक संतुलन, कानून-व्यवस्था और सामुदायिक संरचना से जुड़ा हुआ विषय बन जाता है।
जनजातीय क्षेत्रों में स्थिति
जनजातीय क्षेत्रों में विस्तार से खतरा: प्रदेश में ईसाई आबादी के आधिकारिक आंकड़े सीमित दिखाई देते हैं, किंतु असंगठित चर्च और प्रार्थना केंद्रों की संख्या और विभिन्न क्षेत्रों में उनकी बढ़ती उपस्थिति, एक समानांतर विस्तार की ओर संकेत करती है। विशेषकर जनजातीय क्षेत्रों में यह विस्तार अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जहां कनवर्जन की घटनाएं केंद्रित रूप में सामने आती हैं।
अंतरधार्मिक विवाह प्रावधान
अंतरधार्मिक विवाह की सूचना अनिवार्य: अलग-अलग धर्म के महिला और पुरुष के बीच विवाह की स्थिति में इसकी सूचना 60 दिन पहले देनी होगी। विवाह कराने वाले को भी इसकी सूचना देनी होगी। कानून में केवल विवाह के उद्देश्य से किए जाने वाले धर्मांतरण अवैध माना गया है।
कानून की आवश्यकता
इस वजह से जरूरी था कानून: मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए ऐसे ही सख्त कानून की मांग लंबे समय से की जा रही थी, क्योंकि इसकी वजह से प्रदेश की पूरी आदिवासी आस्था और संस्कृति खतरे में जाती दिख रही थी। नारायणपुर, आमानेड़ा (कांकेर), बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में कनवर्जन से जुड़े विवाद बार-बार सामने आए हैं। कई मामलों में यह सामाजिक टकराव और हिंसक घटनाओं तक पहुंचा है।
जनसंख्या परिवर्तन स्थिति
बढ़ रही है ईसाई आबादी: जशपुर, सरगुजा और बस्तर संभाग में कनवर्जन की गतिविधियां लंबे समय से दर्ज होती रही हैं। जशपुर जिले में ईसाई आबादी का अनुपात राज्य के अन्य जिलों की तुलना में अधिक है, जबकि बस्तर और नारायणपुर के अनेक ग्रामों में हाल के वर्षों में जनसंख्या संरचना में तीव्र परिवर्तन देखा गया है। भूमिपावेड़ा, तेरखुल, घुमियापाल, चिपोल, कोहड़ा, ओरछा और गुदाली जैसे ग्रामों में ईसाई आबादी बहुसंख्यक स्थिति तक पहुंच चुकी है।
