‘‘जनगणना से परिसीमन तकः नारी शक्ति वंदन के साथ जनजातीय प्रतिनिधित्व की नई दिशा‘‘

भारत में लोकतंत्र केवल चुनावों की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता का भी प्रश्न जब हम जनजातीय समान-डॉ. दीपमाला रावत विशेषकर जनजातीय विषय विशेषज्ञ, महिलाओं की बात जनजातीय प्रकोष्ठ, करते हैं, तो यह प्रश्न लोक भवन, भोपाल और भी गहरा हो जाता है। आज देश में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर जो बहस चल रही है, वह केवल महिलाओं के आरक्षण तक सीमित नहीं हैय यह सीधे-सीधे जनगणना और परिसीमन से जुड़ी उस संरचनात्मक सच्चाई को उजागर करती
है, जो दशकों से अनदेखी की जा रही है। जनगणना और परिसीमनः लोकतंत्र की बुनियादी शर्त
जनगणना वह आधार है, जो बताती है कि देश में कौन, कितना और कहां है।
जनगणना और परिसीमन, जनजातीय आरक्षण की रीढ़ हैं। इनके बिना न तो सही प्रतिनिधित्व संभव है, न ही सामाजिक न्याय। इसके बिना आरक्षण का कोई भी ढांचा वास्तविक नहीं हो सकता। संविधान का स्पष्ट सिद्धांत है कि अनुसूचित जनजाति और
अनुसूचित जाति की जितनी जनसंख्या होगी, उसी अनुपात में उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
लेकिन विडंबना यह है कि आज भी लोकसभा की 543 सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना पर आधारित है। वहीं मध्यप्रदेश में विधानसभा परिसीमन वर्ष 2001 की जनगणना पर आधारित है यानी आज की वास्तविक जनसंख्या-विशेषकर तेजी से बढ़ती जनजातीय आबादी अच तक अपने प्रतिनिधित्व का सही अधिकार नहीं पा सकी है। परिसीमन इस पूरी प्रक्रिया का दूसरा स्तंभ है। यह तय करता है कि किन क्षेत्रों को आरक्षित किया जाएगा और किन्हें नहीं। अगर जनगणना पुरानी है, तो परिसीमन भी अधूरा और असंतुलित होगा। परिणामस्वरूप, कई ऐसे क्षेत्र जहां जनजातीय आबादी बढ़ चुकी है, वहां आज भी आरक्षित सीटें नहीं है। परिसीमन किए बिना महिला आरक्षण देना अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के साथ अन्याय है।
जनजातीय महिलाः दोहरे हाशिए की सच्चाई जनजाति महिला के लिए राजनीति केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि परंपरागत आध्यात्म, संस्कृति, दैवीय आस्था, जल, जंगल, जमीन
और अस्तित्व की रक्षा का संघर्ष है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम हमारे लिए एक ‘‘सशक्तिकरण का पुल‘‘ था-एक ऐसा अवसर जो हमें मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ सकता था, और परिसीमन अधिनियम आदिवासी आबादी के अनुरूप प्रतिनिधित्व का अधिकार देता। परन्तु विपक्ष का विरोध केवल देरी नहीं है-यह उस आदिवासी वर्ग के साथ अन्याय है, जो पहले से ही संसाधनों और राजनीतिक अवसरों में पीछे हैं।मेरा शोधः जमीनी सच्चाई क्या कहती है? मध्यप्रदेश देश का सबसे अधिक जनजाति जनसंख्या वाला राज्य है जिसमें हर पांचवा व्यक्ति जनजाति वर्ग का है।
मध्यप्रदेश के खंडवा जिले की जनजाति आरक्षित विधानसभा क्षेत्र-हरसूद और पंधाना में मेरे द्वारा वर्ष 2021-22 में 304 जनजाति वर्ग के जनप्रतिनिधियों (155 महिलाएं, 149 पुरुष) के बीच क्या लोकसभाध्विधानसभा में महिला आरक्षण होना चाहिए, ? पर सर्वेक्षण किया गया।
परिणाम चौकाने वाले थेः रु98.68ः उत्तरदाताओं ने स्पष्ट कहा कि लोकसभाध्विधानसभा में महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए । यह समर्थन केवल महिलाओं तक सीमित नहीं था, बल्कि पुरुष जनप्रतिनिधियों ने भी इसे समान रूप से स्वीकार किया। यह आंकड़ा बताता है कि जनजातीय समाज स्वयं महिला नेतृत्व के लिए तैयार है, लेकिन राजनीतिक ढांचा अभी भी पीछे है। इतिहास गवाह हैः अवसर नहीं, संघर्ष मिला मध्यप्रदेश विधानसभा के इतिहास पर नजर ढाले, तो तस्वीर और भी गंभीर हो जाती है। पहली विधानसभा में 50 एसटी सीटों में केवल 4 महिलाएं चौथी विधानसभा में 58 एसटी सीटों में एक भी महिला नहीं यही दुर्दशा सभी विधानसभा कार्यकाल में रही। हाल की विधानसभा में भी 47 सीटों पर केवल 10 महिलाएं यह आंकड़े चताते हैं कि प्रतिनिधित्व का संकट संरचनात्मक है, न कि क्षमता का। इसलिए कोटे में भी महिला कोटा दिया जाना चाहिए।
राजनीतिक विरोध या सामाजिक न्याय पर प्रहार ?
आज जब विपक्ष और उसके सहयोगी दल नारी शक्ति चंदन अधिनियम और प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया का विरोध करते हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक असहमति नहीं रह जाती।
यह सीधे-सीधे उन संभावनाओं पर प्रहार है, जिनसे एसटी सीटों की संख्या बढ़ सकती है, महिलाओं को वास्तविक प्रतिनिधित्व मिल सकता है, और लोकतंत्र अधिक समावेशी बन सकता है
हम कोई खैरात नहीं मांग रहे। हम वह अधिकार मांग रहे हैं, जो संविधान ने हमें दिया है।
जनगणना हमें गिनती देती है, परिसीमन हमें जगह देता है-और नारी शक्ति वंदन हमें आवाज देता है।
अब समय है कि यह ‘वंदन‘ केवल कागजों में न रहे, बल्कि संसद और विधानसभा में हमारे ‘अस्तित्व‘ के रूप में दिखे

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