जिस उम्र में बच्चे वीडियो गेम खेलते हैं, अपने करियर की बातें करते हैं और जीवन में रोमांटिक हो जाते हैं। उस उम्र में दो बच्चों के अंदर आजादी का रोमांस था, जिद थी कि इन अत्याचारी अंग्रेजों से बदला लेना है। सब छोड़ दिया अपनी पढ़ाई, अपना परिवार, अपने रोमांटिक सपने। इनको तो प्रेम भारत माता से था। आज हम बात कर रहे है उस क्रन्तिकारी की जो चन्द्रशेखर आज़ाद के सामान कभी अंग्रेज़ो की पकड़ में नहीं आया, लेकिन यह घटना 1908 की थी , और वह क्रन्तिकारी थे प्रफुल्ल चाकी।
प्रफुल्ल चाकी का जन्म 10 दिसंबर 1888 को बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) के बोगरा जिले में हुआ, बचपन में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई, तब मां ने कठिन परिस्थितियों में उनका पालन पोषण किया। 1905 के बंगाल विभाजन ने उनके विद्रोह की ज्वाला को जगा दिया और बंग भंग आंदोलन में भाग लिया, तब वह नौवीं कक्षा के थे और उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। विद्यार्थी जीवन का संपर्क स्वामी महेश्वरानंद द्वारा स्थापित गुप्त क्रांतिकारी संगठन से हुआ, स्वामी विवेकानंद के साहित्य एवं राष्ट्रवादी विचारो ने उनके भीतर देशभक्ति की ज्वाला प्रज्ज्वलित कर दी थी। रंगपुर नेशनल स्कूल में उन्होंने जितेंद्र नारायण राय, अविनाश चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारी संपर्क किया और युगांतर संगठन जुड़ गए। युगांतर समिति के समय ही उन्होंने सुना कि कोलकाता के के प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड अपने कठोर दमनकारी व्यवहार के कारण क्रांतिकारियों को सजा देते थे, तब क्रांतिकारियों ने उन्हें दंडित करने का निर्णय लिया। यह कार्य प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस को सोपा गया। ब्रिटिश सरकार भी संभावित खतरे को भाँपते हुए उन्होंने किंग्सफोर्ड का स्थानांतरण कोलकाता से मुजफ्फरपुर कर दिया, लेकिन क्रांतिकारी वहां पहुंच गए। कई दिन तक उनकी गतिविधियों को निरीक्षण किया और तय रात्रि में क्लब से लौटेंगे तब उन पर बम फेंक कर मार देंगे। 30 अप्रैल 1908 को यूरोपीय क्लब से किंग्सफोर्ड की बग्गी निकली जिस पर खुदीराम बोसे एवं प्रफुल्ल चाकी ने बम फेंक दिया लेकिन दुर्भाग्य से उस दिन किंग्सफोर्ड गाड़ी में नहीं था, उसमें दो यूरोपीय महिला मिसेज और मिस कैनेडी सवार थीं जिनकी वही मृत्यु हो गई।
इस घटना के बाद प्रफुल्ल चाकी समस्तीपुर पहुंचे, वेश बदलकर ट्रेन से भागने का प्रयास किया लेकिन दुर्भाग्य से उस कोच में सब-इंस्पेक्टर नंदलाल बनर्जी भी उपस्थित था, उसे संदेह हो गया और उसने अगले स्टेशन पर सूचना देकर गिरफ्तारी की व्यवस्था करवा दी, जैसे ही अगले स्टेशन मोकामा ट्रैन पहुंची और प्रफुल्ल चाकी को घेर लिया। प्रफुल्ल चाकी ने स्थिति को समझा, अंग्रेज चाहते थे उसे ज़िंदा पकड़ना, ताकि उससे राज उगलवा सकें। पर प्रफुल्ल ने सोचा— इन गोरों के हाथ लगने से अच्छा है, अपनी मिट्टी में मिल जाना। उन्होंने अपनी रिवॉल्वर से स्वयं को गोली मार कर 1 मई 1960 को मातृभूमि के लिए अपने प्राण समर्पित कर दिए।
अब सुनिए वो बात जिसे सुनकर कलेजा मुंह को आ जाए। इतिहासकार कालीचरण घोष ने अपनी पुस्तक ‘रोल ऑफ ऑनर’ उल्लेख किया है कि प्रफुल्ल चाकी ने अभियान के दौरान अपना नाम दिनेश चंद्र राय रखा था, उनके बलिदान के पश्चात उनकी पहचान करने के बहाने उन्होंने प्रफुल्ल का सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया। उस कटे हुए सिर को एक स्पिरिट के डिब्बे में बंद किया गया और कलकत्ता भेजा गया। क्यों? ताकि कोर्ट में सबूत पेश किया जा सके और खुदीराम बोस को डराया जा सके। ऐतिहासिक विवरण के अनुसार जब उनका सिर खुदीराम बोस के सामने लाया तो उन्होंने सम्मानपूर्वक नमन किया और यह पहचान सुनिश्चित हो गई।
सोचिए उस माँ पर क्या गुजरी होगी, जब उसे पता चला कि उसके 20-21 साल के क्रांतिकारी बेटे का कटा हुआ सिर कोर्ट लाया गया था । क्या हम इस बलिदान को भूल गए ? क्या हमें सिर्फ एक पक्ष ही याद है सत्याग्रह अहिंसा गांधीवादी आंदोलन ?? वास्तव में भारत की आजादी में उदारवाद उग्रवाद गांधीवाद क्रांतिकारी मजदूर किसान सब का योगदान है।
क्रांतिकारियों के योगदान पर सवाल उठाए जा सकते हैं कि वे अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाए। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या असहयोग, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो जैसे आंदोलन अपने लक्ष्य तक पहुँच पाए? फिर इन्हे स्वतंत्रता संग्राम में इन्हें महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
क्रांतिकारी आंदोलन का उद्देश्य लोगों को जागृत करना, अपने प्राणों की आहुति देकर साम्राज्यवाद पर दबाव डालना था। इन क्रांतिकारियों ने यह काम बखूबी किया। वे फांसी पर झूल गए, जेल में यातनाएँ झेलीं और लोगों में राष्ट्र प्रेम की आँखें जगाईं। यह भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है।
लेकिन हमारा मतलब यह नहीं है कि संघर्ष का एकमात्र रास्ता हिंसा है। बारीन्द्र घोष कहते हैं कि हम इन तरीकों से देश को आजाद नहीं कराना चाहते बल्कि हम लोगों को यह सिखाना चाहते हैं कि हम देश के लिए मर मिटने को तैयार हैं।
आज इन नायकों की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करना ज़रूरी है क्योंकि इन क्रांतिकारियों ने देश को जगाने में, लोगों का प्यार पाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है और उन्हें आज भी याद किया जाता है।
इतिहास भले ही उन्हें विस्मृत कर दे , इतिहास भले उनकी गाथा न लिखे लेकिन आज लोक संगीत, लोक कथाएं में आज भी इनके स्वर गूंज रहे हैं और हमारा हृदय आज भी इनको नमन करता है और इनसे हमें अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करने की प्रेरणा सदा मिलती रहती है।

