रोमियो-जूलियट क्लॉज: कानून, समाज और भारतीय चेतना

हाल के दिनों में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक टिप्पणी ने कानून, समाज और संस्कृति के बीच संतुलन को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ द्वारा की गई यह टिप्पणी केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी निर्देश नहीं है, बल्कि न्यायालय के समक्ष आए कुछ विशिष्ट मामलों की पृष्ठभूमि में व्यक्त किया गया एक दृष्टिकोण मात्र है, जिसके आधार पर ‘रोमियो–जूलियट क्लॉज’ जैसे विचारों पर चर्चा प्रारंभ हुई। इसे कानून में सुधार की अनिवार्यता के रूप में नहीं, बल्कि एक बहस योग्य प्रस्ताव के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

यह प्रश्न केवल कानून की व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की दिशा, पारिवारिक संरचना और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। क्या कानून को सामाजिक यथार्थ के अनुरूप अधिक विवेकशील होना चाहिए, या फिर ऐसा लचीलापन हमारी सांस्कृतिक और नैतिक जड़ों को कमजोर कर देगा-यही इस विमर्श का केंद्रीय प्रश्न है।

रोमियो–जूलियट क्लॉज: उत्पत्ति और पृष्ठभूमि
‘रोमियो–जूलियट क्लॉज’ की अवधारणा का जन्म मुख्यतः पश्चिमी देशों, विशेष रूप से अमेरिका, में हुआ। 1990 के दशक में वहाँ यह अनुभव किया गया कि ‘स्टैच्यूटरी रेप’ से जुड़े कानून कई बार परिस्थितियों की सूक्ष्मता को ध्यान में रखे बिना लागू हो रहे हैं। कुछ मामलों में, सीमित आयु-अंतर और पारस्परिक सहमति के बावजूद, कानून के परिणाम अत्यंत कठोर सिद्ध हुए।
इन्हीं अनुभवों के आधार पर अमेरिका के कुछ राज्यों, कनाडा और कुछ यूरोपीय देशों में अपवाद या दंड में छूट जैसे प्रावधान विकसित किए गए। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन देशों की सामाजिक संरचना, पारिवारिक व्यवस्था और नैतिक मानक भारत से भिन्न हैं। इसलिए वहाँ जो समाधान व्यावहारिक प्रतीत हुआ, वह भारतीय संदर्भ में उसी रूप में उपयुक्त हो-यह आवश्यक नहीं।

POCSO अधिनियम: उद्देश्य और व्यावहारिक चुनौतियाँ
भारत में POCSO अधिनियम का मूल उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण, हिंसा और आपराधिक कृत्यों से कठोर संरक्षण प्रदान करना है। यह कानून अपनी भावना और उद्देश्य में अत्यंत आवश्यक तथा प्रगतिशील है। किंतु न्यायालयों के समक्ष आए कुछ मामलों ने यह प्रश्न अवश्य उठाया है कि क्या हर परिस्थिति में इसके प्रावधान समान रूप से न्यायपूर्ण परिणाम दे पा रहे हैं।
कुछ मामलों में यह देखा गया है कि सीमित आयु-अंतर वाले किशोर संबंध भी गंभीर आपराधिक धाराओं के अंतर्गत आ गए। वहीं, कुछ स्थितियों में पारिवारिक या सामाजिक असहमति के कारण कानून का उपयोग दबाव के साधन के रूप में भी हुआ। इन तथ्यों को रेखांकित करना कानून के विरोध के रूप में नहीं, बल्कि उसके अधिक संतुलित और उद्देश्यपरक उपयोग की आवश्यकता के संकेत के रूप में समझा जाना चाहिए।

यह तर्क भी प्रस्तुत किया जाता है कि ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या से न्यायिक तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है, किंतु यह प्रश्न खुला हुआ है कि क्या इस दबाव का समाधान कानून को शिथिल करने में है, या उसके विवेकपूर्ण और सीमित उपयोग में।

भारतीय परिप्रेक्ष्य: क्यों विशेष सावधानी आवश्यक है

भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना पश्चिमी समाजों से मूलतः भिन्न है। यहाँ परिवार केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि संस्कार, संरक्षण और उत्तरदायित्व की आधारशिला है। 18 वर्ष की वैधानिक आयु-सीमा को समाज में एक प्रकार के सुरक्षा-कवच के रूप में देखा जाता है।

यदि इस सीमा को अत्यधिक लचीला बनाया गया, तो सहमति की अवधारणा की आड़ में वास्तविक शोषण को वैध ठहराने का जोखिम उत्पन्न हो सकता है। विशेषकर ग्रामीण और सामाजिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में, जहाँ बाल विवाह और शिक्षा की कमी जैसी समस्याएँ अब भी विद्यमान हैं, किसी भी प्रकार की कानूनी शिथिलता के दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

भारतीय परंपराएँ केवल व्यक्तिगत इच्छा पर नहीं, बल्कि संयम, उत्तरदायित्व और पारिवारिक मार्गदर्शन जैसे मूल्यों पर आधारित रही हैं। अतः किसी भी विदेशी अवधारणा को अपनाने से पूर्व उसके दीर्घकालिक सामाजिक प्रभावों पर गंभीर विचार आवश्यक है।

कानून की आड़ में संभावित सामाजिक दुष्परिणाम
यदि ‘रोमियो–जूलियट क्लॉज’ जैसे प्रावधानों को भारतीय सामाजिक यथार्थ को समझे बिना लागू किया गया, तो इसके कई दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं। सहमति की अवधारणा का दुरुपयोग, अभिभावकीय भूमिका का कमजोर होना, ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक दबावों का वैधीकरण, और नैतिक मानकों में भ्रम-ये सभी संभावित जोखिम हैं।

जब कानून और सामाजिक संस्कारों के बीच स्पष्ट सामंजस्य नहीं रहता, तो युवाओं के मन में यह धारणा बन सकती है कि जो दंडनीय नहीं है, वह नैतिक रूप से भी स्वीकार्य है। यह स्थिति दीर्घकाल में सामाजिक अनुशासन और उत्तरदायित्व को कमजोर कर सकती है।

एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता
यह स्वीकार करना आवश्यक है कि कुछ परिस्थितियों में कानून की कठोरता ने अनावश्यक कठिनाइयाँ उत्पन्न की हैं। किंतु समाधान पूर्ण छूट या आयातित मॉडल को अपनाने में नहीं, बल्कि स्पष्ट सीमाओं, सामाजिक संवेदनशीलता और न्यायिक विवेक के संतुलित प्रयोग में निहित है।

नई शिक्षा नीति (NEP) भी चरित्र निर्माण, उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता पर बल देती है। इसी भावना के अनुरूप, कानून का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि सामाजिक प्रयोगों का माध्यम बनना।

समाधान: कानून से आगे समाज की भूमिका
केवल कानूनी संशोधन पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविक सुधार समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था की सहभागिता से ही संभव है। कानूनी साक्षरता, माता–पिता और बच्चों के बीच संवाद, तथा न्यायालयों को सीमित किंतु स्पष्ट विवेकाधिकार-ये सभी मिलकर संतुलन स्थापित कर सकते हैं।

जहाँ शोषण, हिंसा और आपराधिक मंशा स्पष्ट हो, वहाँ कठोरतम दंड अनिवार्य है। वहीं, जहाँ केवल किशोरावस्था की नासमझी परिलक्षित हो, वहाँ परामर्श, काउंसलिंग और सुधारात्मक उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

इस संपूर्ण विमर्श का सार यही है कि कानून न तो भावनात्मक दबाव में ढीला पड़े, और न ही इतना कठोर हो कि वह समाज की वास्तविकताओं से कट जाए। यह भी अपेक्षित है कि संवैधानिक संस्थाएँ किसी भी विचार को अपनाते समय भारतीय समाज की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संरचना को केंद्र में रखें, न कि किसी आयातित वैचारिक ढाँचे या पश्चिमी अथवा साम्यवादी (कम्युनिस्ट) सामाजिक सिद्धांतों को यांत्रिक रूप से स्वीकार करें।

भारत का समाज वर्ग-संघर्ष या राज्य-प्रधान दृष्टि से नहीं, बल्कि परिवार, दायित्व और सामाजिक संतुलन की चेतना से संचालित रहा है। यदि कानून ऐसे वैचारिक प्रयोगों का माध्यम बनता है जो भारतीय अनुभव से मेल नहीं खाते, तो वह समाज की आत्मा से कट जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि न्यायिक विवेक भारतीय दृष्टि और भारतीय यथार्थ में निहित रहे।
कानून तभी सार्थक होगा जब वह केवल दंड का साधन न होकर, समाज को दिशा देने वाला नैतिक और सभ्यतागत आधार भी बने।

डॉ. राधा मिश्रा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *