“स्वाधीनता संग्राम में आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक समरसता के शिरोमणि बने श्रीगणेश”


“ॐ गं गणपतये नम:”

सत्य सनातन धर्म में भगवान् श्रीगणेश का आध्यात्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्व अद्भुत एवं अद्वितीय है। सनातन धर्म में मांगलिक कार्यों प्रारंभ ही श्रीगणेश का पर्याय है। हिन्दू धर्म शास्त्रों अनुसार भगवान गणेश जी का प्राकट्य सतयुग में भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि, स्वाति नक्षत्र, अभिजीत मुहूर्त और सिंह लग्न में दोपहर के प्रहर में हुआ था।

हिंदू धर्म में भाद्रपद माह भगवान गणेश के अवतरण से जुड़ा है। हर वर्ष शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को एक महोत्सव की तरह मनाया जाता है, जो 10 दिनों तक लगातार चलता है। ऐंसे में गणेश चतुर्थी के शुभ मुहूर्त के बारे में भी जान लेना आवश्यक हो जाता है। वैदिक हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि का प्रारंभ 26 अगस्त को दोपहर 01 बजकर 54 मिनट पर होगा और इसका समापन 27 अगस्त की दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर होगा। चूंकि उदयातिथि मान्य होती है, इसीलिए इस साल गणेश चर्तुथी का पर्व 27 अगस्त, बुधवार को मनाया जाएगा। हर वर्ष गणेश विसर्जन अनंत चतुर्दशी के दिन होता है, इस वर्ष यह 7 सितंबर, रविवार को होगा। गणपति स्थापना के लिए मध्याह्न काल सबसे उत्तम माना गया है, क्योंकि उनके अवतरण का समय यही था।इस वर्ष गणेश चतुर्थी का आरंभ बुधवार के दिन से हो रहा है, जो गणेश जी का ही दिन माना जाता है। इसके अतिरिक्त इस दिन शुक्ल योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग जैसे योगों का निर्माण हो रहा है।

सतयुग में विनायक, त्रेतायुग में मयूरेश्वर, द्वापर में गजानन और कलयुग में भगवान् कल्कि के साथ श्रीगणेश का प्राकट्य धूम्रवर्ण और शूर्पकर्ण के रुप में होगा। जबलपुर में स्थित सुप्तेश्वर गणेश मंदिर इसका प्रमाण है। श्रीगणेश बुद्धि के देवता और विघ्नहर्ता के रुप में सनातन धर्म में शिरोधार्य हैं।

भारतवर्ष और सनातनियों पर जब – जब संकटों के कृष्ण मेघ छाए तब – तब भगवान् किसी न किसी रुप में संकटमोचक के रुप में आए। मध्य काल में मुस्लिम आक्राताओं के विरुद्ध श्रीराम और श्रीकृष्ण आध्यात्मिक शक्ति के रुप में संकटमोचक बने तो हर हर महादेव का स्वर युद्धघोष बना।

वहीं आधुनिक युग में जब बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम छिड़ा तब उसके उत्कर्ष और स्व की रक्षा के लिए श्रीगणेश आध्यात्मिक ऊर्जा के केन्द्र बिन्दु बने।

भगवान् श्रीगणेश की प्रेरणा से ही स्व के आलोक में लोकमान्य तिलक जी का नारा “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है”उद्भूत हुआ था। इसलिए श्रीगणेश,स्वतंत्रता संग्राम के अमर महानायक, राष्ट्रीय एकता सामाजिक समरसता के प्रतीक हैं।

यद्यपि अनादि काल भगवान् गणेश की पूजा अर्चना होती आ रही है परंतु सातवाहनों, राष्ट्रकूटों, चालुक्यों के काल से सार्वजनिक रुप से गणेशोत्सव मनाने के प्रमाण मिलते हैं।

छत्रपति शिवाजी महाराज की माताश्री जीजाबाई ने पुणे में कस्बा गणपति की स्थापना कर लोकव्यापीकण की नींव रखी। पेशवा युग गणेशोत्सव धूमधाम से मनाया जाने लगा परंतु भद्र परिवारों तक सीमित रहा।

वहीं आगे चलकर बरतानिया सरकार ने हिन्दुओं के पर्वों को सार्वजनिक मनाए जाने पर रोक लगा दी। अतः लोकमान्य तिलक महोदय ने स्वतंत्रता संग्राम को व्यापक रुप देने, राष्ट्रीय एकता स्थापित करने तथा सामाजिक समरसता के परिप्रेक्ष्य में जात-पांत और छुआछूत को समाप्त करने के लिए गणेशोत्सव का वृहत स्तर पर लोकव्यापीकण किया।

भारत के स्वाधीनता संग्राम में गणपति महोत्सव का अद्भुत एवं अद्वितीय योगदान रहा है। रौलेट एक्ट समिति ने गणेशोत्सव के प्रति गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए, इस पर कड़ी निगरानी रखने की समझाईश दी थी। इसके बाद से ही बरतानिया सरकार ने गणेशोत्सव पर सख्त निगरानी रखी, बावजूद इसके गणेशोत्सव के समय स्वाधीनता संग्राम की अलख जगाई जाती थी। इसलिए स्वाधीनता के अमृत महोत्सव में गणेशोत्सव के योगदान को रेखांकित किए बिना स्वाधीनता संग्राम का इतिहास अधूरा ही रह जाएगा।

स्वराज के संघर्ष के लिए लोकमान्य तिलक अपनी बात को जन-जन तक पहुंचाना चाहते थे।एतदर्थ उन्हें एक सार्वजनिक मंच की आवश्यकता थी, अतः उन्होंने गणपति उत्सव को चुना और आगे बढ़ाया। तिलक जी ने गणेश उत्सव के बाद शिवाजी के नाम पर भी लोगों को आपस में जोड़ा तिलक द्वारा प्रारंभ, गणेश उत्सव से गजानन राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गए।

तिलक जी निर्देशन में सन् 1893 से तमाम विरोधों के बाद भी गणपति महोत्सव सार्वजनिक रुप से मनाया गया। लोकमान्य तिलक के कर कमलों से श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई गणपति की स्थापना हुई। स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने हेतु अनेक मल्लों को संगठित किया गया। क्रांतिकारियों को संरक्षण दिया गया।

अविलंब ही इसका व्यापक विस्तार हुआ। संपूर्ण भारत में सभी जातियों के लोग। गणेशोत्सव मनाने लगे। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में कवि गोविंद ने गणेशोत्सव के समय राष्ट्रीयता से ओतप्रोत गीतों का प्रचलन आरंभ किया जिन्हें “पोवाडे” कहा गया।

गणेशोत्सव के समय लोकमान्य तिलक जी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, पं मदनमोहन मालवीय, विनायक दामोदर वीर सावरकर जी सदैव सहभागिता करते और अपने भाषणों से स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय एकता की अलख जगाते थे।

यद्यपि जबलपुर में भी 1893 से गणेशोत्सव आरंभ हो गया था, परन्तु लोकमान्य तिलक जी 1916 में प्रथम बार और उसके बाद 1917 से जबलपुर में भी सार्वजनिक रुप से भालदारपुरा में मराठी समाज के साथ सभी ने मिलकर गणपति रखे जाने की परंपरा प्रारंभ की। जो अब महाराष्ट्र विद्यालय में परंपरा चल रही है।

पुणे के ग्राम देवता अर्थात कसबा पेठ गणपति, स्वाधीनता पूर्व कालावधि में जनमानस में देशभक्ति की भावना जागृत करने के उद्देश्य से मेलों और सभाओं का आयोजन किया जाता था।

सन् 1901 में स्थापित तुलसी बाग़ गणपति, गणेशोत्सव मंडल के कार्यकर्ता पुणे के क्रांतिकारियों की गुप्त सभाओं में सहभागी होते थे। सन् 1928 में गणेश गल्ली, लालबाग सार्वजनिक उत्सव मंडल की स्थापना हुई।

सन् 1945 में अद्भुत एवं अद्वितीय झांकी प्रस्तुत की गई, जिसमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस स्वाधीनता के सूर्योदय का रथ चला रहे हैं और रथ में श्रीगणेश विराजमान हैं। यह झांकी इतनी लोकप्रिय हुई कि 10 दिनों की जगह 45 दिनों बाद गणेश विसर्जन किया गया था।

लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल द्वारा सन् 1934 से सन् 1947 तक विविध राष्ट्रीय विचारधारा के नेताओं के भाषण आयोजित किये गए। देशभक्ति की भावनाओं को बढ़ा देने वाली झाकियां, सजावट तैयार की जाती थी।

वहीं सन् 1920 में स्थापित ठाणे के श्री गणेशोत्सव लोकमान्य आली मंडल ने सन् 1931 में अस्पृश्यों के मेले का आयोजन किया था। बाल गंगाधर तिलक जी के विचारों का अनुसरण करते हुए, खामगाँव बुलढाणा के तानाजी गणेशोत्सव मंडल के कार्यकर्ताओं ने स्वाधीनता संग्राम सहित गोवा मुक्ति आन्दोलन में सहभागिता की तथा कारावास में भी समय काटा था।

सिंहावलोकन यह है कि श्रीगणेश भारतीय स्वाधीनता संग्राम में स्व के प्रतीक ही नहीं वरन् राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक समरसता के आध्यात्मिक पिता बने।वर्तमान में भारत में ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्व में गणेशोत्सव पर्व सनातनियों द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है। विश्व के सुख और समृद्धि की कामना करते हुए,सनातनियों का यह गणेशोत्सव पर्व, हर युग में प्रासंगिक रहेगा।

“एकदंताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात् ।

गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।”

लेखक – डॉ. आनंद सिंह राणा

विभागाध्यक्ष इतिहास विभाग श्रीजानकीरमण महाविद्यालय जबलपुर एवं इतिहास संकलन समिति महाकौशल।

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