-सुषमा यदुवंशी
भाषा मानव समाज की मूलभूत आवश्यकता है, जिसके बिना विचारों, भावनाओं और संस्कृति का आदान-प्रदान संभव नहीं। हिंदी, जो भारत की प्रमुख भाषा होने के साथ-साथ आज एक वैश्विक संपर्क भाषा के रूप में उभर रही है, विश्व के अनेक देशों में न केवल बोली जा रही है बल्कि अध्ययन, अध्यापन और सृजन का माध्यम भी बन चुकी है। यह शोध-लेख हिंदी के ऐतिहासिक विकास, अंतरराष्ट्रीय विस्तार, गैर-भारतीय हिंदी सेवियों के योगदान तथा आधुनिक वैश्विक संदर्भों में हिंदी की प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है।
भाषा का मानव समाज से अटूट संबंध है। भाषा के माध्यम से ही सभ्यताओं का विकास, संस्कृति का संरक्षण और ज्ञान का प्रसार संभव हुआ है। भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध उक्ति —
“चार कोस पर पानी बदले, आठ कोस पर वाणी”— भाषाई विविधता और परिवर्तनशीलता को रेखांकित करती है।
आज के वैश्वीकरण के युग में भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव का भी माध्यम बन चुकी है। हिंदी इस संदर्भ में विशेष महत्व रखती है।
14 सितंबर 1950 को भारतीय संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। इसी स्मृति में हिंदी दिवस मनाया जाता है।
वहीं 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन की स्मृति में विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। हिंदी दिवस जहाँ राष्ट्रीय आत्मचिंतन का अवसर है, वहीं विश्व हिंदी दिवस हिंदी को वैश्विक मंच प्रदान करता है।
पिछले कुछ दशकों में हिंदी ने अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय विस्तार किया है। आज हिंदी 200 से अधिक देशों में किसी न किसी रूप में बोली, समझी या पढ़ाई जाती है।
वैश्विक कंपनियाँ भारतीय बाज़ार और प्रवासी भारतीय समुदाय को ध्यान में रखते हुए हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को अपने प्रचार माध्यम के रूप में अपना रही हैं। इससे हिंदी की व्यावसायिक उपयोगिता भी सिद्ध होती है।
गोविंद बल्लभ पंत ने कहा था कि हिंदी और देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार को रोका नहीं जा सकता। उनके शब्द आज सत्य सिद्ध हो रहे हैं। एक भाषा के रूप में हिंदी न केवल अन्य भाषाओं से प्रतिस्पर्धा कर रही है, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान भी बना रही है। भारत को गर्व है कि हिंदी ने चीन की राजभाषा मंदारिन को पीछे छोड़ते हुए विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा का स्थान प्राप्त किया है। आँकड़ों के अनुसार, 206 देशों में हिंदी बोलने वालों की संख्या अन्य सभी भाषाओं से अधिक हो चुकी है।
पिछले एक दशक में हिंदी का अंतरराष्ट्रीय विस्तार उसकी उपयोगिता और लोकप्रियता को दर्शाता है। 1952 में पाठकों ने हिंदी को विश्व की पाँचवीं प्रमुख भाषा माना था। 1980 के दशक तक यह चीनी और अंग्रेज़ी के बाद तीसरे स्थान पर पहुँच गई। आज हिंदी अपने लोकप्रियता के शिखर पर है। संभवतः हिंदी ने किसी भी अन्य भाषा की तुलना में सबसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय विकास किया है। विभिन्न संस्थानों, सरकारी तंत्रों और छोटे-बड़े उद्यमों ने हिंदी को इस मुकाम तक पहुँचाने में योगदान दिया है।
पिछले एक दशक में हिंदी का अंतरराष्ट्रीय विस्तार उसकी उपयोगिता और लोकप्रियता को दर्शाता है। 1952 में पाठकों ने हिंदी को विश्व की पाँचवीं प्रमुख भाषा माना था। 1980 के दशक तक यह चीनी और अंग्रेज़ी के बाद तीसरे स्थान पर पहुँच गई। आज हिंदी अपने लोकप्रियता के शिखर पर है। संभवतः हिंदी ने किसी भी अन्य भाषा की तुलना में सबसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय विकास किया है। विभिन्न संस्थानों, सरकारी तंत्रों और छोटे-बड़े उद्यमों ने हिंदी को इस मुकाम तक पहुँचाने में योगदान दिया है।
इस हिंदी दिवस पर हमें उन गैर-भारतीय हिंदी प्रेमियों के प्रयासों को भी नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने हिंदी को अपनी मातृभाषा न होने के बावजूद अपनाया। विशेष रूप से वे लोग उल्लेखनीय हैं जिन्होंने अंग्रेज़ी या अन्य भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद हिंदी सीखी, उसे पढ़ाया, उसमें लिखा और अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी को समृद्ध किया।
फादर कामिल बुल्के ऐसे ही एक महान व्यक्तित्व थे। शायद ही कोई ऐसा हो जिसने कठिन अंग्रेज़ी शब्दों के सही हिंदी अर्थ के लिए उनके हिंदी-अंग्रेज़ी शब्दकोश का सहारा न लिया हो। फादर बुल्के ने अपना पूरा जीवन हिंदी की सेवा में समर्पित कर दिया। उनका शब्दकोश आज भी सर्वाधिक प्रामाणिक माना जाता है, जिसमें लगभग 40,000 प्रविष्टियाँ हैं। इस प्रकार, फादर कामिल बुल्के जैसे लोगों ने हिंदी को एक वैश्विक संपर्क भाषा बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसी संदर्भ में जापान की कात्सु सान का उल्लेख आवश्यक है, जो 1956 में भारत आईं और बौद्ध दर्शन से इतनी प्रभावित हुईं कि भारत को ही अपना स्थायी निवास बना लिया। उन्होंने काका साहब कालेकर से हिंदी सीखी और जापान से आए बौद्ध भिक्षुओं को हिंदी सिखाई।
ब्रिटेन की गिलियन राइट हिंदी में व्याख्यान देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो सरस्वती उनकी जिह्वा पर निवास करती हों। वे बीबीसी लंदन से भी जुड़ी रहीं। उन्होंने राही मासूम रज़ा के “आधा गाँव” और श्रीलाल शुक्ल के “राग दरबारी” का अंग्रेज़ी अनुवाद किया। आधा गाँव की भाषा और वातावरण को समझने के लिए उन्होंने लेखक के परिवार से भेंट की, इमामबाड़ों का भ्रमण किया और शोक-रीतियों को समझा। उन्होंने भीष्म साहनी की रचनाओं का भी अनुवाद किया।
चीन के प्रोफेसर चांग छिंगकुई ने दशकों तक बीजिंग विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन और अध्यापन किया। जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की स्थापना में भी विद्वानों का योगदान रहा। प्रोफेसर तोबिताकानाका ने भीष्म साहनी के उपन्यास “तमस” का जापानी अनुवाद किया। प्रोफेसर कोगा ने जापानी-हिंदी शब्दकोश तैयार किया और महात्मा गांधी की आत्मकथा का जापानी अनुवाद किया।
गुयाना और मॉरीशस में प्राथमिक से लेकर स्नातकोत्तर स्तर तक सुव्यवस्थित हिंदी शिक्षा प्रणाली है। फिजी, नेपाल, भूटान, मालदीव, श्रीलंका और खाड़ी देशों में भी हिंदी तेजी से फैल रही है।
विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 50 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं और लगभग एक अरब लोग इसे समझते हैं।
भारत में कई लेखक, जो अंग्रेज़ी के प्राध्यापक रहे, उन्होंने हिंदी को अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम चुना।
हिंदी आज केवल एक राष्ट्रभाषा नहीं रही, बल्कि एक सशक्त वैश्विक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। इसका विस्तार साहित्य, शिक्षा, व्यापार और सांस्कृतिक संवाद के माध्यम से निरंतर हो रहा है।
इस संदर्भ में कवि ज्ञानेंद्रपति की उक्ति स्मरणीय है—
“हिंदी की गाय का दूध दुहने वाले बहुत हैं, पर उसे चारा देने वाले कम।”
अतः आवश्यकता है कि हम हिंदी के उपयोग के साथ-साथ उसके संवर्धन और संरक्षण के प्रति भी सजग रहें।
लेखिका स्तंभकार, शिक्षाविद, मनोवैज्ञानिक हैं
