संघ शताब्दी वर्ष आलेख शृंखला षष्ठ दिवस
स्त्री जिसमें सृजन की, संरक्षण की अदभुत क्षमता है जो रीतियों नीतियों की संवाहक और मूल्य व संस्कृति की पोषक है। भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब-जब उसे आगे बढ़ने के अवसर मिले उसने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी मजबूत और दमदार उपस्थिति दर्ज कराई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस वर्ष विजयादशमी पर अपनी स्थापना की 100 वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य हमेशा से समाज में सकारात्मक परिवर्तन द्वारा समाज व राष्ट्र का उत्कर्ष रहा है। हमारी सनातन संस्कृति के जीवन मूल्यों से अनुप्राणित संघ की हर क्रिया, हर गतिविधि में भारतबोध का गहन भाव और विचार परिलक्षित होता है। समाज और राष्ट्र के साथ संपूर्ण मानव मात्र के कल्याण और विकास का कार्य कर रहा संघ आज विश्व का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन बन गया है। संघ का उद्देश्य यही रहा है कि उसका हर कार्य समाज के प्रत्येक घर, परिवार तक पहुंचे और राष्ट्र सुसंस्कृत और संगठित बने।
नारी किसी भी घर या परिवार की धुरी का केंद्र बिंदु होती है। भारतीय जीवन मूल्य और परंपरा में नारी को सदैव पूजनीय, वंदित और सम्मानित माना गया है। उसने सृष्टि के आरम्भ से लेकर आज तक घर, समाज और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाई है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक अवसर, और निर्णय में उनकी सहभागिता होती है। जिन सनातन मूल्यों को लेकर संघ चलता है वह मूल्य व परंपरा स्त्री व पुरुष को परस्पर पूरक मानते हैं। हमारे यहां अर्धनारीश्वर की संकल्पना का आधार भी यही है।
संघ के शारीरिक व बौद्धिक प्रशिक्षण के लिए लगने वाली शाखाओ में महिलाएं नहीं होती इसलिए कुछ संघ विरोधियों को लगता है कि संघ केवल पुरुषों की बात करता है, संघ में स्त्री की भागीदारी ही नहीं है। विशेष कर वामपंथी आलोचकों द्वारा यह झूठ खूब प्रचारित किया जाता है कि संघ कट्टरपंथी मानसिकता का है और रूढ़िवादिता से ग्रस्त संगठन है जिसमें आधी आबादी की कोई हिस्सेदारी नहीं है। संघ का मानना है कि नारी समाज की परिवार रूपी इकाई का आधार है। अतः इस शक्ति की ओर संघ का ध्यान, चिंता सदैव रही है।
संघ के बौद्धिक व चरित्र निर्माण के कार्यक्रमों में नारी शक्ति की सदैव सहभागिता रही है। संघ में स्त्री की भागीदारी को लेकर एक कार्यक्रम में आदरणीय सर संघचालक डॉ मोहन भागवत जी ने कहा हमारे जितने स्वयंसेवक है कम से कम उतनी ही महिलाएं भी हमारे साथ है। कोई स्वयंसेवक की मां है या उसकी पत्नी या उसकी बहन है। साथ ही उन्होंने कहा कि आरएसएस स्वयंसेवक अपनी जिम्मेदारी आसानी से पूरी कर पाते हैं क्योंकि उनके परिवार की महिलाएं चाहती है कि वह ऐसा करें। इसी पर बात करते हुए भागवत जी ने कहा कि जब एक बार कोई व्यक्ति संघ में शामिल हो जाता है और एक स्वयंसेवक के रूप में राष्ट्र और समाज की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर देता है तो उसका परिवार स्वाभाविक रूप से संघ परिवार का हिस्सा बन जाता है।
संघ की शाखा में जाने वाले, संघ को मानने वाले लोग यह भली भांति जानते हैं कि एक स्त्री का सम्मान कैसे किया जाता है। संघ के विचार से प्रेरित हर स्वयंसेवक को एक स्त्री में भगिनी, मां, बेटी का भाव आता है। संघ के संस्कारों से संस्कारित परिवार के पुरुष स्त्री के प्रति सदैव आदर व सम्मान का भाव रखते हैं और यह उनके परिवार जीवन में सहज ही नजर आता है।
जो लोग यह आरोप लगाते हैं कि संघ रूढ़िवादी और पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त है वह इस बात को जान ले कि संघ ने अपनी स्थापना के महज 11 वर्ष बाद ही 1936 में राष्ट्र सेविका समिति का गठन कर दिया था। राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना महिलाओं के लिए की गई थी ताकि वह आरएसएस के समानांतर एक संगठन के रूप में कार्य कर सके। जिसमें सिर्फ महिलाएं ही होती है।
राष्ट्र सेविका समिति के माध्यम से यह व्यवस्था बनी कि समाज की महिलाओं में व्यक्तित्व निर्माण व संगठन का काम राष्ट्र सेविका समिति के माध्यम से होगा। देश के सभी तहसीलों में इसकी शाखाएं हैं जिसमें लाखों बहने संघ के कार्यों को जमीनी स्तर पर मूर्त रूप देने में लगी है। इससे निकली कार्यकर्ता देश के कई महत्वपूर्ण पदों पर पहुंची है।
राष्ट्रीय सेविका समिति की संस्थापिका व प्रथम प्रमुख संचालिका आ.लक्ष्मीबाई केलकर का सोचना था कि यदि समाज में सभी लोग आपस में मिलते जुलते रहेंगे तब संस्कारों का कार्य बिना प्रयास अपने आप ही होगा। उन्होंने अपने जीवन और कृतित्व के माध्यम से सेविकाओं के सामने आदर्श प्रस्तुत किया। राष्ट्रीय सेविका समिति की कार्यकर्ता सुमित्रा महाजन देश के लोकसभा की स्पीकर रही है।
दिवंगत सुषमा स्वराज केंद्र सरकार में विदेश मंत्री सहित अनेक जिम्मेदारियां को निभाती रही। वह भी राष्ट्र सेविका समिति से जुड़ी थी। वर्तमान में राष्ट्रीय सेविका समिति विविध क्षेत्रों में कार्यरत है। वह समाज निर्माण का कार्य साहित्य निर्माण द्वारा, विविध कार्यक्रमों के आयोजन द्वारा, बौद्धिक चर्चा व सेवा कार्यों के द्वारा कर रही है।
भारत की अधिकांश तहसीलों में इसकी शाखाएं हैं। भारत के बाहर 22 देशो में इसके शाखाएं हैं। इसकी प्रथम शाखा वर्धा में स्थापित हुई और वहां से जो प्रवाह शुरू हुआ वह संपूर्ण भारत के साथ भारत के बाहर विदेशों में भी फैला ।1978 तक राष्ट्र सेविका समिति का विस्तार संपूर्ण भारत में हो चुका था। वर्तमान में इसका मुख्यालय नागपुर में है। देश में इस समय इसकी कुल 4900 शाखाएं कार्यरत है।
वर्ष 2008 में संघ ने अपनी अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में नारी गरिमा को लेकर एक प्रस्ताव पारित किया जिसका मूल नारी के प्रति संघ का दृष्टिकोण और कर्तव्य था। संघ ने अनुभव किया की तेजी से परिवर्तित समाज मे सार्थक परिवर्तन लाने हेतु केवल सरकार और सरकारी कोशिशो के भरोसे बैठना उचित नहीं होगा। अप- संस्कृति के प्रचार-प्रसार के कारण समाज मे आ रहे नकारात्मक भाव, बढ़ते अपराध हेतु समाज की मानसिकता में बदलाव आवश्यक है। बलात्कार, हत्या, लिव इन रिलेशन, तलाक, लव जिहाद जैसे कृत्य भारतीय समाज के लिए घातक है। अतः इन पर नियंत्रण हेतु परिवार नामक संस्था को सशक्त और संस्कारित करने की आवश्यकता है। परिवार की धुरी स्त्री को सजग और सशक्त किए बिना समाज विकसित नहीं हो सकता।
पिछले वर्ष से महिला समन्वय का कार्य भी प्रारंभ हुआ जिसके द्वारा समाज के सभी वर्गों की महिलाओं के मध्य समन्वय का कार्य किया जा रहा है। पिछले वर्ष महिला समन्वय द्वारा सम्पूर्ण देश में मातृ शक्ति सम्मेलन का ऐतिहासिक आयोजन किया गया। इसी के द्वारा आपरेशन सिंदूर की सफलता पर शौर्य सम्मान यात्रा का देश भर में आयोजन किया गया।
समाज और राष्ट्र के विकास के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रारंभ स ही आधी आबादी को अपने चिंतन में रखा है। संघ का मानना है कि महिलाओं को सशक्त बनाना राष्ट्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण है। एक सशक्त महिला पूरे समाज को ऊपर उठती है ये भाव संघ का सदैव से रहा है।
संघ के समांतर चलने वाले अनेक अनुसांगिक संगठनो में भी महिलाओं की भूमिका प्रभावी रूप से रहती है। जैसे भारतीय स्त्री शक्ति जो महिलाओं द्वारा महिलाओं के बीच चलाये जाने वाला संगठन है। 1988 में इसकी स्थापना हुई। यह संगठन महिलाओं के शिक्षा एवं कौशल विकास, मानसिक शारीरिक स्वास्थ्य, आत्म सम्मान, आर्थिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के लिए काम करता है।
सरस्वती शिशु मंदिर जो 1977 से स्थापित है, सबको सुलभ और अपनी संस्कृति से संबंधित शिक्षा प्रदान करने वाला विश्व का सबसे बड़ा गैर सरकारी शैक्षिक संगठन है। यहां पर छात्राओं और महिला अध्यापिकाओं की संख्या भी सर्वाधिक है। यहां के पाठ्यक्रम में संस्कार, शील के साथ छात्राओं को आत्मरक्षा का गुण भी सिखाया जाता है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में सिर्फ लड़के नहीं होते हैं बल्कि उनके ही बराबर लड़कियां भी सदस्यता लेती है। उच्च शिक्षा में सक्रिय यह संगठन लड़कियों में स्वाभिमान, स्वालंबन के साथ लीडरशिप के गुण को विकसित करता है।
भारतीय मजदूर संघ, संस्कार भारती, प्रज्ञा प्रवाह ,सेवा भारती जैसे अनेक संगठन है जो संघ के विचारों के अनुरूप समाज और राष्ट्र निर्माण के कार्य में तत्पर है इनमें भी लगातार संख्यात्मक और गुणात्मक रूप से महिलाएं सक्रिय होकर अपना कार्य कर रही है।
संघ की कार्यपद्धति सम्पूर्ण समाज को संगठित करने की है। नारी शक्ति प्रारंभ से ही उसके चिंतन और कार्पणाली का हिस्सा रही है। संघ में स्त्री शक्ति अनेक तरीकों से, अनेक भूमिकाओं में अपने दायित्वों का निर्वहन करती है और इसी के साथ समाज निर्माण में, राष्ट्र निर्माण में अपनी निर्णायक भूमिका को दृढ़ता के साथ निभा कर अपनी असीमित क्षमताओं का परिचय देती है।

लेखिका और शिक्षाविद्
